बढ़ते रेल हादसों को रोकने के लिए रेलवे पटरियों की निगरानी ड्रोन कैमरों से करेगा। रेलवे ऐसे ड्रोन कैमरों की खरीद करेगा जो ऊपर से ही ट्रैक की फिश प्लेट, पैंड्रॉल क्लिप और फ्रैक्चर की निगरानी कर सके। रेलवे इससे पहले ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल डेडीकेडेट फ्रेट कॉरिडोर के प्रोजेक्ट में कर चुका है। वहां सफल होने के बाद विभाग ने ट्रैक की संरक्षा के मद्देनजर ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल करने की पहल की है। रेलवे बोर्ड ने हाल में ही सभी जोनल मुख्यालयों को निर्देशित किया है कि वह रेल पटरियों की निगरानी के लिए ड्रोन का इस्तेमाल करें। इससे रेलवे ट्रैक के अलावा रेलवे की परियोजनाओं और रेल संपत्तियों की निगरानी हो जाएगी। इससे वहां निर्माण या मरम्मत का काम कराने में रेलवे को आसानी होगी।
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हाई रेज्यूलेशन कैमरे का होगा ड्रोन
30 से 40 मीटर की ऊंचाई से पटरियों की निगरानी करने के लिए रेलवे हाई रेज्यूलेशन वाला ड्रोन कैमरा खरीदेगा। ताकि रेल ट्रैक पर फिश प्लेट, पैंड्रॉल क्लिप और ट्रैक के फ्रैक्चर की फुटेज साफ आ सके। रोटेटर के जरिए पटरियों के बगल में लगे बोल्टों की तस्वीर भी कैद हो सकेगी। इसके साथ ही ड्रोन से ही ओएचई लाइन और खंभों की निगरानी भी की जाएगी। स्टेशन पर लगे कंप्यूटर को ड्रोन से कनेक्ट कर दिया जाएगा।
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रेलवे पहले ही कर चुका है इस्तेमाल
रेलवे रात के वक्त अपनी संपत्तियों की निगरानी ड्रोन कैमरों से कर चुका है। उत्तर रेलवे ने ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल डेडीकेडेट फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी) के निर्माण में बनारस से सुल्तानपुर के बीच किया था। निगरानी से उसे फायदा भी मिला था।
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हादसे वाले स्टेशनों पर ज्यादा निगरानी
हाल में पुखराया, रूरा, औरैया में हुए बड़े रेल हादसों से कानपुर रेल एक्सिडेंट जोन ही कहलाने लगा था। सूत्रों के अनुसार जिन क्षेत्रों में रेल हादसे हुए वहां पर निगरानी के लिए रेलवे ज्यादा ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल कर सकता है। आम तौर पर ड्रोन आठ से दस किलोमीटर की दूरी तय करता है। रेलवे हर प्रमुख स्टेशनों पर ड्रोन कैमरों का प्रयोग करेगा। किसी स्टेशन पर एक से ज्यादा का भी इस्तेमाल किया जाएगा।