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‘यूपी में पंजाबी भाषा पाठ्यक्रम शुरू करे सरकार’

Mon, 07 Sep 2015 01:51 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, कानपुर
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यूपी के विकास में सिख समुदाय का बड़ा योगदान होने के बावजूद यहां पंजाबी भाषा उपेक्षित है। रविवार को मोतीझील के लाजपत भवन में आयोजित तीसरी उत्तर भारतीय पंजाबी कांफ्रेंस में इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया गया।
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वक्ताओं ने प्रदेश सरकार से सरकारी प्राथमिक शिक्षा में पंजाबी भाषा का पाठ्यक्रम शुरू करने की मांग की। साथ ही प्रदेश में एक पंजाबी विश्वविद्यालय और एक अकादमी स्थापित किए जाने पर भी जोर दिया।

मुख्य अतिथि पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के कुलपति डा. जसपाल सिंह ने कहा कि मातृ भाषा की दृष्टि से हम कमजोर होते जा रहे हैं। पंजाबी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए ही यह सेमिनार आयोजित किया गया है।
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यूपी में सिख समुदाय के लोगों की संख्या काफी है पर पंजाबी भाषा का प्रचार प्रसार नहीं है। अंग्रेजी हुकूमत तो समाप्त हो गई, लेकिन देश में भाषाई गुलामी अभी भी कायम है। इसे दूरे करने के लिए सरकारी तौर पर भाषा को मान्यता देना जरूरी है। कमिश्नर मो. इफ्तिखारुद्दीन  ने कहा कि भाषा को संप्रदाय से जोड़ दिया गया है, यह उचित नहीं है।

जब हमें कोई बात हमारी मातृ भाषा में समझाई जाती है, तो वह अच्छी तरह समझ में आती है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद सुखदेव सिंह ढींढसा ने कहा कि दिल्ली के बाद सबसे ज्यादा सिख यूपी में हैं। ऐसे में भाषाई तौर पर समुदाय के लोगों को सभी सुविधाएं मिलनी चाहिए।

मुख्य वक्ता डा. जोधराज सिंह ने कहा कि राज्य सरकार पंजाबी को तीसरी भाषा के रूप में शामिल करे। इस मौके पर सेमिनार से जुड़ी एक पत्रिका का विमोचन किया गया। संचालन सरदार जोगा सिंह ने किया।

पंजाबी कांफ्रेंस का उद्देश्य
पंजाबी को क्षेत्रीय भाषा का दर्जा दिलाना। पंजाब और हरियाणा के बाद सर्वाधिक सिख यूपी में हैं। यूपी में सर्वाधिक कानपुर में लगभग तीन लाख आबादी। शहर में पंजाबी विश्वविद्यालय की मांग की गई है।

कांफ्रेंस की नींव
पंजाबी विश्वविद्यालय के कुलपति जसपाल सिंह ने 1 मई 2008 को पटियाला में पहली पंजाबी कांफ्रेंस की। इसके बाद दूसरी पटियाला में, तीसरी धनबाद झारखंड में, चौथी कोलकाता में, पांचवीं इंदौर मध्यप्रदेश में। इसके बाद पहली उत्तर भारतीय पंजाबी कांफ्रेंस 2012 में ऋषिकेश उत्तराखंड में, दूसरी शिमला हिमाचल प्रदेश में, तीसरी कानपुर में।

श्रीगुरु सिंह सभा शामिल नहीं हुई
पंजाबी कांफ्रेंस में श्रीगुरु सिंह सभा लाटूश रोड और श्रीगुरु सिंह सभा महानगर कानपुर के पदाधिकारी दूर रहे। शहर में श्रीगुरु सिंह सभा सबसे बड़ी संस्था है और इससे 50 गुरुद्वारे और अन्य कमेटियां जुड़ी हैं। सालभर में कई बड़े धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन भी करती है। इसी प्रकार श्रीगुरु सिंह सभा भी दो बड़े कार्यक्रम आयोजित करती हैं।

‘साड्डा हक’ इत्थे रख
कानपुर। पंजाब से चलकर हिमाचल, जम्मू कश्मीर वाया कनाडा, आस्ट्रेलिया की राजनीति में सिखों का सिक्का पिछले कई वर्षों से चल रहा है। अब यूपी की सत्ता में ‘दाल’ गलाने की जद्दोजहद शुरू हो गई है। रविवार को तीसरे उत्तर भारतीय पंजाबी सम्मेलन के बहाने यहां देश भर के पंजाबी समुदाय के लोग जुटे।

उनका कहना है कि दुनिया के कई मुल्कों में वह अपनी बादशाहत साबित कर चुके हैं। यूपी उनके लिए अभी भी मील का पत्थर बना हुआ है। अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य सरदार त्रिलोचन सिंह का कहना है कि अपने हुनर और जिगर के दम पर सिख दुनिया भर में जाने जा रहे हैं। तो ऐसी कौन सी बात है कि यूपी सरकार उन्हें नहीं पहचान पा रही है।

बिना राजनीति के अब गुजारा नहीं है। हक तभी मिलेगा, जब अपने लोग सत्ता में होंगे। 1984 दंगा पीड़ित कमेटी के चेयरमैन सरदार कुलदीप सिंह भोगल ने कहा कि यूपी में हमारी जबान ही हमारी ताकत बनेगी। हम अपनी विरासत को साथ लेकर चलते हुए यूपी का विकास और उसकी सत्ता में अपनी भागीदारी के लिए प्रयास कर रहे हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींढसा ने इंदिरा हत्याकांड के दौरान सिखों पर हुए हमले को अपनी कमजोर ताकत से जोड़ा। उन्होंने कहा कि दो सिखों ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी तो बाकी सिखों का इसमें क्या कसूर था। इंदिरा गांधी क्या महात्मा गांधी से बड़ी लीडर थीं।

उनके हत्यारे गोडसे के अलावा उनकी जाति से जुड़े किसी दूसरे पर कोई हमला नहीं हुआ। इसके पीछे हमारी ताकत का कमजोर होना है। अब समय आ गया है कि हम राजनीति के जरिये सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
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