कानपुर राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (एनएसआई) ने चीनी उद्योग से बगास के रूप में निकलने वाले अपशिष्ट से मिथाइल लेवुलिनेट बनाने में सफलता पाई है। बगास का उपयोग बॉयलर र्में इंधन के रूप में किया जाता है। जल्द ही संस्थान पेटेंट आवेदन करेगा।
निदेशक प्रो. नरेेंद्र मोहन ने बताया कि चीनी उद्योग आय के लिए सिर्फ चीनी पर निर्भर न रहे और उनकी आय बढ़े, इस बात को ध्यान में रखते हुए दो वर्षों के प्रयास के बाद मिथाइल लेवुलिनेट बनाने में सफलता पाई है।
इसका प्रयोग कैंसर में लोकलाइजिंग एजेंट और फोटोनिमिक थेरेपी समेत कई उद्योगों में प्लास्टिसाइजिंग एजेंट के रूप में किया जाता है। एनएसआई के कार्बनिक रसायन अनुभाग के सहायक आचार्य डॉ. विष्णु प्रभाकर श्रीवास्तव ने बताया कि इस उत्पाद से लेवुलिनिर एसिड बनाया जाता है, जिसकी कीमत 500-800 रुपया प्रति किलोग्राम है। संस्थान ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है, जिससे रसायन की लागत कम हो और प्रक्रिया भी आसान हो। अनुसंधान सहायक डॉ. चित्रा यादव और अध्येता तुषार मिश्रा ने बताया कि इसकी गुणवत्ता बाजार में उपलब्ध रसायन के बराबर है।
कहां है उपयोगी
मिथाइल लेवुलिनेट का उपयोग यातायात, चिकित्सा, कृषि एवं खाद्य उद्योगों में किया जाता है। एंटी फ्रीजिंग (ठंड से न जमना) गुण के कारण ठंडे एवं उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में बायो डीजल में मिलाने, खाद्य पदार्थों में फ्लेवर, कृषि कार्यों में कीटनाशक, खरपतवार नाशक और पौधों के विकास केलिए किया जाता है।