कानपुर। मेडिकल कॉलेजों की तर्ज पर अब मनमाने दामों पर दवाएं बेचने वाले निजी अस्पतालों, क्लीनिकों पर भी शिकंजा कसने की तैयारी की जा रही है। शासन के निर्देश पर वास्तविक लागत और अंकित एमआरपी के बीच भारी मुनाफे की जांच शुरू की गई है। ड्रग विभाग में हर सप्ताह निजी अस्पतालों में मरीजों को बहुत महंगी दवाएं दिए जाने की तीन-चार शिकायतें पहुंच रही हैं।
दवा व्यापार मंडल के महामंत्री राजेंद्र सैनी के अनुसार, दवा बाजार में 70-80 प्रतिशत बिजनेस पर प्रोपोगंडा कंपनियों की दवाओं का एकाधिकार (मोनोपोली) हो गया है। इसके चलते मरीजों को विवश होकर अस्पताल परिसर से ही कई गुना महंगे दामों पर दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। मनमाने मार्जिन का खेल इस तरह चल रहा है कि जिस एंटीबायोटिक इंजेक्शन या दवा की वास्तविक लागत मात्र 100 होती है, उस पर 500 तक एमआरपी छाप दी जाती है जबकि प्रतिष्ठित ब्रांडेड कंपनियों का वही दवा लगभग 250 में उपलब्ध है।
शासन के निर्देश पर मेडिकल कॉलेजों में खुले मेडिकल स्टोर की जांच चल रही है। दवाओं की मूल कीमत और एमआरपी में अंतर की भी पड़ताल की जा रही है। अत्यधिक मार्जिन वसूलने वालों वाले निजी अस्पतालों पर भी कार्रवाई की जाएगी।
-ओमपाल,ड्रग इंस्पेक्टर