कानपुर के मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और सीनियर चेस्ट फिजीशियन प्रोफेसर एसके कटियार ने आईआईटी के सहयोग से अपने एक शोध के हवाले से बताया कि हवा का पहला फिल्टर नाक होता है। जब हवा में आद्रता कम होती है, लू चलती है तो नाक के अंदर की नमी खत्म हो जाती है। ऐसे में अल्ट्रा फाइन कण सांस के माध्यम से अधिक मात्रा में शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
ये प्रदूषण के कण सीधे खून में मिलते हैं और शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। वहीं कचरा आदि जलाने से वातावरण में जहरीली गैस की मात्रा बढ़ती है, यह भी नुकसान करती है लेकिन इससे बचाव के उपाय हैं। सबसे अधिक नुकसान डीजल का धुआं करता है। उन्होंने बताया कि अल्ट्रा फाइन कणों को फेफड़ों की छन्नियां भी नहीं रोक पाती हैं।