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सुखराम को हो गई राम-राम!

Sun, 14 Dec 2014 02:32 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर
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शुक्रवार को शहर आए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सपा के ताकतवर वरिष्ठ नेता सुखराम सिंह यादव की जिस तरह फजीहत की, उससे पार्टी की अंदरखाने की राजनीति में हलचल मच गई है।
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कोई इसे मुख्यमंत्री का बड़ा राजनीतिक संदेश तो कोई सोची-समझी रणनीति बता रहा है। इसके पीछे मंशा चाहे भी हो, पर इतना तय है कि अखिलेश यादव ने सुखराम को निशाने पर लेकर इतना जरूर जता दिया कि सत्ता की धुरी एक ही है, हद में रहें तो ही ठीक रहेगा।
शहर के लिए इस बड़ी राजनीतिक घटना के साथ ही पार्टी के भीतर नए समीकरण बनने भी शुरू हो गए हैं। दूसरी तरफ, सुखराम सिंह यादव यह साबित करने में जुटे रहे कि वह एक क्षणिक मामला था, उनकी पार्टी में हैसियत न तो कम थी और न ही है।
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सुखराम शनिवार को कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव के साथ रहे। माना जा रहा है कि अखिलेश के तेवर देख शिवपाल की शरण में गए हैं।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक अखिलेश यादव अरसे से सुखराम से नाराज चल रहे थे। लोकसभा चुनाव के दौरान भी उन तक शिकायतें पहुंची थीं।
लोकसभा चुनाव लड़ रहे सुरेंद्र मोहन अग्रवाल के खेमे ने शिकायत की थी कि सुखराम एंड कंपनी सहयोग करने के बजाय निपटाने में जुटी है। तब उन्हें हिदायत भी दी गई थी। बात आई-गई हो गई।
सपा सत्ता में आई तो स्थानीय नेताओं में लालबत्ती पाने की होड़ मच गई। मुलायम सिंह यादव से नजदीकी के चलते सुखराम सिंह को लालबत्ती (पिछड़ा वर्ग एवं वित्त आयोग के चेयरमैन बनाए गए) मिल गई।
बस फिर क्या था, उनका सिक्का चलने लगा। सूरजमुखी प्रजाति के न जाने कितने नेता उनकी चौखट पर हाजिरी बजाने लगे।
सुखराम को लगा कि हम तो नेताजी के आशीर्वाद से बने हैं तो किसी की क्या मजाल जो उन्हें आंख दिखाए पर अनुभवी सुखराम यह भूल गए कि यह बात किसी को नागवार भी गुजर सकती है।
उगते सूरज को भी प्रणाम करना जरूरी है। वह कभी इधर दिखते तो कभी उधर। उनकी निष्ठा पर सवाल उठते रहे। विघ्नसंतोषी नेता उनके मुंह पर उनकी जैसी बोलते पर ऊपर जाकर काम लगाने में भी नहीं चूकते थे।
सपा के ही एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि ज्योति हत्याकांड पर भी सुखराम पर सवाल उठे थे। उन पर अभियुक्तों की पैरवी करने का आरोप लगा और यह बात भी मुख्यमंत्री तक पहुंच गई।
इस मामले में हाईकमान की त्यौरियां देख वह हट लिए पर उनकेकैरेक्टर रोल में काले पन्ने की तरह इस एपीसोड को भी जोड़ लिया गया। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लालबत्ती छीनने का सिलसिला शुरू हुआ तो सुखराम भी पैदल हो गए।
बताते हैं कि सुखराम को यह बुरा लगा और उन्होंने मुलायम सिंह यादव से अपनी पीड़ा जाहिर करने के साथ अपने कुछ विरोधियों की शिकायत भी कर दी। यह बात भी अखिलेश यादव तक पहुंची।
सपा के राजनीतिक ज्ञानी कहते हैं कि शुक्रवार को तो अनुशासन हर नेता तार-तार कर रहा था पर मुख्यमंत्री ने सारा नजला सुखराम पर ही उतार दिया। सार्वजनिक रूप से भरी सभा में अनुशासन की सीख के बहाने जता दिया कि अब किसी को सुखराम के भौकाल में आने की जरूरत नहीं है।
इत्ती सर्दी में राजनीतिक कसरतियों के करतब से सुखराम पसीना-पसीना थे। सुखरामविरोधियों की छाती तो ठंडी हो गई परसुखराम दिल में आग लिए शिवपाल सिंह यादव के पास पहुंच गए।
इस संवाददाता ने शनिवार दिन में 12.30 पर सुखराम सिंह फोन मिलाया तो आउट ऑफ रीच था। तब मैसेज सेंड किया और फिर 1.30 पर उनका फोन आ गया। पूछा-कल सीएम साहब आप पर क्यों नाराज हो गए?
जवाब मिला-अरे कुछ नहीं, राजनीति में सब चलता ही रहता है, परिवार बड़ा होता है तो ये सब होता ही है। मेरे घर में तो बचपन से ही राजनीति की खेती होती रही है, मुख्यमंत्रीजी का हर आदेश और निर्देश मानूंगा।
 तो क्या विरोधियों ने आप के खिलाफ कान भर दिए थे? कौन कान भरता है, कौन नहीं, मैं नहीं जानता। मैं (हंसते हुए) अभी शिवपाल सिंह जी (लोक निर्माण मंत्री) के साथ विजयवाड़ा में हूं, अभी-अभी एयरपोर्ट पर उतरा हूं, पार्टी की मीटिंग है, ये लीजिये शिवपालजी से बात कीजिये...जी ये अमर उजाला से हैं... बात कर लीजिये। शिवपाल सिंह से इस संवाददाता ने कल के प्रकरण के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा-अनुशासन जरूरी है, गल्ती पर डांटते भी रहते हैं, कुछ गलतफहमियां हो जाती हैं, बाकी कोई बात नहीं।
इस मुद्दे पर स्थानीय नेता ऑन द रिकॉर्ड हटते-बचते दिखे। पूर्व जिलाध्यक्ष चंद्रेश सिंह ने कहा कि यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। जैसी परिस्थिति थी, वैसा किया।
जिलाध्यक्ष ओम प्रकाश मिश्र का कहना है कि ऐसा कुछ भी नहीं है, एकाएक जो हुआ सो हुआ। दूसरी तरफ, राजनीतिक कारीगर अपनी-अपनी तरह से सुखराम प्रकरण की समीक्षा करने में जुटे हैं।
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