सड़क हादसे में घायल होने के बाद जाम में फंसने से जान गंवाने वाले सिपाही प्रांशु सचान का शव बृहस्पतिवार दोपहर करीब 3:30 बजे पैतृक गांव मोतीपुर पहुंचा तो पूरे गांव में मातम छा गया। जिस इकलौते बेटे से माता-पिता को बुढ़ापे का सहारा बनने और बहन की शादी की उम्मीद थी, उसकी अर्थी देखकर मां विभा की चीख निकल गई। बहन चांदनी बदहवास हो गईं, जबकि पिता प्रमोद सचान की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। परिवार के लोगों का कहना था कि अगर प्रांशु को समय रहते अस्पताल पहुंचा दिया जाता तो शायद उसकी जान बच सकती थी। वे व्यवस्था को भी कोसते रहे।
प्रांशु परिवार का इकलौता बेटा था। परिवार के पास महज ढाई बीघा खेती है और पिता गांव में शिक्षामित्र हैं। पुलिस में नौकरी मिलने के बाद प्रांशु ने घर की जिम्मेदारियां अपने कंधों पर उठा ली थीं। परिवार को उम्मीद थी कि उसकी कमाई से आर्थिक स्थिति सुधरेगी और बड़ी बहन चांदनी की शादी धूमधाम से होगी। प्रांशु बहन के लिए लड़का भी तलाश रहा था। घर में उसकी शादी को लेकर बुने जा रहे सपने भाई की मौत के साथ ही बिखर गए।
प्रांशु की चाची नेहा ने बताया कि वह पढ़ाई में काफी होनहार था। बीएससी करने के बाद पॉलिटेक्निक की पढ़ाई कर रहा था। इसी दौरान उसका पुलिस में चयन हो गया। 17 अप्रैल 2025 को वह पुलिस ट्रेनिंग के लिए गया था। प्रशिक्षण के बाद उसे अंबेडकरनगर में तैनाती मिली थी। किसी ने नहीं सोचा था कि परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाला बेटा इतनी जल्दी दुनिया छोड़ देगा।
शव गांव पहुंचने की सूचना पर पहले से ही बड़ी संख्या में महिला और पुरुष घर के बाहर जुट गए थे। पार्थिव शरीर देखते ही हर किसी की आंखें नम हो गईं। ग्रामीण घायल पिता को संभालते रहे, जबकि महिलाएं मां और बहन को ढाढ़स बंधाती रहीं। मां की सूनी गोद, पिता का छिना सहारा और बहन की उजड़ी दुनिया देखकर गांव का हर व्यक्ति गमगीन हो गया।
सलामी के बाद बाग में हुआ अंतिम संस्कार
प्रांशु का शव गांव पहुंचने के बाद अंतिम संस्कार के लिए ले जाने से पहले पुलिसकर्मियों ने पार्थिव शरीर को सलामी दी। इसके बाद अंतिम यात्रा निकली तो ग्रामीणों की भीड़ उमड़ पड़ी। गांव के बाहर स्थित परिवार के बाग में उसका अंतिम संस्कार किया गया। जिस बेटे को परिवार ने अपने सपनों का सहारा बनाया था, उसे अंतिम विदाई देते समय माता-पिता और बहन का दर्द देखकर हर आंख नम हो गई।