कानपुर में पुलिस कमिश्नरी लागू करने के पीछे शासन का मकसद यही है कि अपराध और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे, लेकिन किसी चुनौती से कम नहीं। पिछले एक साल में बिकरू और संजीत अपहरण हत्याकांड ने शहर पुलिस की बड़ी फजीहत कराई। ऐसे में पुलिस कमिश्नरी के सामने चुनौती होगी कि बड़ी वारदातों को कैसे काबू किया जाए। इसमें सबसे अहम थाना स्तर पर पुलिसकर्मियों की निगरानी भी होगी।
चुनौती : 01
अपराधियों से मिलीभगत और लापरवाही
जुलाई 2020 में बिकरू कांड में आठ पुलिसकर्मी शहीद हुए। उसी दौरान बर्रा में संजीत अपहरण हत्याकांड हुआ। दोनों वारदातों की जांच हुई तो पुलिस अफसरों की बड़ी लापरवाही सामने आई। उनकी गलतियों से दोनों कांड हुए। कुछ अफसरों में अनुभव की कमी और अपराधियों के साथ कुछ पुलिसकर्मियों की मिलीभगत ने पुलिस की किरकिरी कराई। तब सवाल उठा था कि अगर कानपुर में पुलिस कमिश्नरी प्रणाली होती तो शायद ऐसी वारदातें न होतीं। वजह यह कि पुलिस कमिश्नरी में उच्चाधिकारियों के हाथों में शहर की कमान होती है। निगरानी के लिए अफसर अधिक होते हैं। अब यहां ये व्यवस्था लागू हो गई है। ऐसे में पुलिस अफसरों से अपेक्षाएं ज्यादा होंगी और उनके सामने बड़ी वारदातों को भांपने की चुनौती। वहीं अपराधियों से सांठगांठ करने वाले पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई भी जरूरी होगी।
चुनौती : 02
आसान नहीं भ्रष्टाचार पर लगाम
पुलिस अफसरों के पास आए दिन दरोगा, सिपाहियों की शिकायतें पहुंचती हैं। खासकर पैसों से लेनदेन और घूसखोरी की। दिव्यांग महिला से डीजल भरवाने के नाम पर भी दरोगाओं ने पैसों की वसूली की थी। एक एसओ चोरी की कार में सवारी कर महकमे की भद्द पिटवा ही चुके हैं। ऐसे तमाम आरोप पुलिस पर लगे। कमिश्नरी में तैनात अफसरों के लिए पुलिसकर्मियों के भ्रष्टाचार पर लगाम कसना भी आसान नहीं होगा।