कानपुर। दालों की फसलों को फफूंदी, जड़ गलन और उकठा जैसे रोगों से बचाने के लिए बीज शोधन की जैविक तकनीक को बढ़ावा दिया जाएगा। अरहर, मूंग, उड़द और चना समेत अन्य दलहनी फसलों के बीजों का शोधन ट्राइकोडर्मा और राइजोबियम से किया जाएगा। इसके लिए दलहन अनुसंधान संस्थान में ट्राइकोडर्मा का उत्पादन किया जाएगा। किसानों को इसके इस्तेमाल की जानकारी और प्रशिक्षण देने के लिए शासन ने संस्थान को ढाई करोड़ रुपये का बजट दिया है।
दलहनी फसलों के बीज बोने के बाद मिट्टी में मौजूद फफूंदी के कारण बीज खराब होने और पौधों की जड़ों में रोग लगने की समस्या रहती है। इससे पौधों का विकास प्रभावित होता है और उत्पादन घट जाता है। इस समस्या से बचाव के लिए बीज को ट्राइकोडर्मा से शोधित किया जाएगा। संस्थान के निदेशक जीपी दीक्षित ने बताया कि जैविक फफूंदी नाशक ट्राइकोडर्मा का उत्पादन संस्थान में ही होगा। किसानों को इसके प्रयोग की विधि भी बताई जाएगी। उन्होंने बताया कि दलहनी फसलों में रोगों की समस्या सेंट्रल यूपी के साथ बुंदेलखंड क्षेत्र में अधिक है। ऐसे में इन क्षेत्रों के किसानों को इस तकनीक से विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है।
राइजोबियम देगा पोषण
बीज शोधन में ट्राइकोडर्मा के साथ राइजोबियम का भी इस्तेमाल होगा। यह लाभदायक जीवाणु दलहनी फसलों की जड़ों में रहकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपयोगी रूप में बदलता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों को नाइट्रोजन मिलता है। यह पौधों की वृद्धि और क्लोरोफिल निर्माण के लिए जरूरी है।
किसानों का मित्र है ट्राइकोडर्मा
ट्राइकोडर्मा एक लाभदायक कवक है जो मिट्टी में पाया जाता है। इसे किसानों का मित्र जैविक फफूंदीनाशक माना जाता है। यह फसलों को कई रोगों से बचाने के साथ पौधों की वृद्धि में भी मदद करता है।