फलों, सब्जियों को पकाने वाले केमिकल, फसलों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक, बिना शोधन के बोरिंग व कुएं के पानी का इस्तेमाल पार्किंसन बीमारी को बढ़ावा दे रहा है। इसमें शरीर के किसी खास अंग की गतिशीलता कम हो जाती है। शरीर कांपने लगता है। चाल धीमी हो जाती है। हाथ पैर अकड़ जाते हैं। मुंह की आकृति बदल जाती है। यह बीमारी महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में ज्यादा होती है।
जनकपुरी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नई दिल्ली के डायरेक्टर प्रो. मनमोहन मेहंदीरत्ता ने शनिवार को जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों और मेडिकल स्टूडेंटों को यह जानकारी दी। मेडिकल कालेज में मूवमेंट डिसआर्डर व पार्किंसन बीमारी पर नेशनल कांफ्रेंस का आयोजन किया गया था। इसमें देश के प्रमुख अस्पतालों के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने पार्किंसन व इसके साइड इफेक्ट से होने वाली बीमारी (मूवमेंट डिसआर्डर) के कारणों, उसके निदान व नई रिसर्च से संबंधित जानकारी साझा की। डॉ. मेहंदीरत्ता ने बताया कि भारतीय डॉक्टरों ने इस लाइलाज बीमारी पर काबू पाने में काफी हद तक महारत हासिल कर ली है।
रोग की पहचान के शुुरुआती पांच साल तक दवाओं से काम चलता है। बाद में ब्रेन की सर्जरी करनी पड़ती है। इसके बाद 10 साल तक बीमारी से राहत मिलती है। इसमें आठ से 10 लाख रुपये तक खर्च आता है। उन्होंने कहा कि खानपान में शुद्धता, जीवन शैली में सुधार, केमिकल व कीटनाशक युक्त भोजन का कम से कम इस्तेमाल ही बीमारी से बचा सकता है।