बिना नागरिकता के बांग्लादेशी नागरिकों (पूर्वी पाक विस्थापितों) के वोटर आईडी बनाने के मामले में गुरुवार को बड़ा खुलासा हुआ है। जिला निर्वाचन दफ्तर ने तत्कालीन एसडीएम सदर प्रहलाद सिंह की वह जांच रिपोर्ट फाइल ढूंढ निकाली है जिसमें कहा गया है कि इन लोगों ने नियम विरुद्ध तरीके से वोटर लिस्ट में नाम शामिल कराया।
फाइल में तत्कालीन एसडीएम सदर का उप जिला निर्वाचन अधिकारी को लिखा पत्र भी मिला है जिसमें लिखा है कि ऐसे 194 बांग्लादेशियों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। नाम हटाए गए या नहीं, यह छानबीन भी शुरू कर दी गई है। अफसर यह तर्क भी दे रहे हैं कि ऐसा भी हो सकता है कि नाम हटाए हों और बाद में फिर शामिल करा लिए गए हों। अब बांग्लादेशियों की संख्या बढ़कर करीब सात सौ हो गई है।
बिना नागरिकता लिए बांग्लादेशियों के वोटर बनने में प्रशासन की चूक और वोट की राजनीति रही। 2010 में लोकसभा में प्रश्न उठने के बाद कांग्रेस की तत्कालीन केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को बांग्लादेशियों के वोटर बनने की जांच करने और नागरिकता न होने पर नाम हटाने को कहा था।
लोकसभा में प्रश्न उठने के बाद राज्य सरकार के आदेश पर एसडीएम सदर ने जांच के बाद नगर सीमा में बस गए 194 बांग्लादेशियों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने की संस्तुति 2010 में की थी। इसके बावजूद वोटर लिस्ट में अभी भी इनके नाम दर्ज हैं।
अब ‘अमर उजाला’ में मामला उठने पर जिलाधिकारी कौशलराज ने जांच शुरू कराई। एडीएम सिटी आशुतोष अग्निहोत्री ने एसडीएम सदर डीडी वर्मा को जांच दी। निर्वाचन दफ्तर से पूछताछ की गई तो कहा गया कि 2010 की कार्रवाई की फाइल नहीं मिल रही।
हीलाहवाली पर एडीएम सिटी ने बुधवार को नोटिस देकर फाइल तलब की और एसडीएम को भी लिखा। एसडीएम ने निर्वाचन दफ्तर में पड़ताल कराई तो कर्मचारियों ने फाइल निकालकर उन्हें थमा दी। फाइल का अध्ययन करने से पता चला कि वोटर लिस्ट से इनके नाम हटाए नहीं गए थे जबकि नाम हटाने का आदेश दिया गया था।
नाम हटाने का आदेश इसीलिए दिया गया था क्योंकि इनके बांग्लादेशी होने की पुष्टि हुई थी। कांग्रेस सरकार के आदेश पर ही देशभर में बांग्लादेशियों की खोज का काम चला था लेकिन अब कानपुर में कांग्रेस नेता अभिजीत सिंह सांगा ही इनकी पैरवी कर रहे हैं।