बीते करीब दो साल में केडीए के विरुद्ध लेबर कोर्ट में एक के बाद एक
मामले दायर हुए हैं। सभी में दावा करने वालों ने कहा है कि वे केडीए के
पूर्व दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी रहे हैं। दावे में वर्ष 1985 से 1995 के बीच
की अवधि का भुगतान बकाया होने की बात कही गई है।
इसके साथ तमाम दस्तावेज
और केडीए में काम करने के प्रमाण भी लगाए गए हैं। ज्यादातर मामलों में एक
हाजिरी रजिस्टर की फोटोकॉपी भी लगाई गई है, जिसमें उपस्थिति का ब्योरा दर्ज
है। इस मामले में केडीए का पक्ष बेहद लचर तरीके से रखा गया, इसके चलते दो
वर्ष में करीब चौबीस मामलों में केडीए केस हार गया। कई मामलों में तो
एकपक्षीय आदेश भी हुए हैं।
इन सबके चलते करीब डेढ़ करोड़ का मुआवजा अदा
करने संबंधी आदेश लेबर कोर्ट से केडीए के विरुद्ध हो चुके हैं। केडीए
सूत्रों के मुताबिक मुआवजे के लिए यह पूरा खेल केडीए के कार्मिक विभाग के
लोगों का रचा हुआ है। दरअसल जिस रजिस्टर की फोटोकॉपी लगाई जाती है, वे
केडीए से गायब कर दिए गए हैं।
कोर्ट जब असल रजिस्टर दिखाने या कर्मचारी न
होने की बात कहता है तो केडीए हाथ खड़े कर देता है। इधर इस गोरखधंधे की
जानकारी किसी ने उपाध्यक्ष को दे दी। इसमें बीते हफ्ते केडीए के खिलाफ हुए
फैसले का हवाला देते हुए बताया गया है कि इसमें किस तरह की लचर पैरवी हुई
है।
साथ ही दस्तावेज उपलब्ध कराने में केडीए के लोग किस तरह से शामिल हैं।
उपाध्यक्ष ने गोपनीय तरीके से जांच कराई तो बात सही निकली। इस पर उन्होंने
केडीए के कानूनी सलाहकार महेशमणि पांडेय को हटाकर उनके स्थान पर सुयश
श्रीवास्तव को नियुक्त किया है। साथ ही पूरे मामले की गहराई से जांच करने
के निर्देश दिए हैं।
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जिन लोगों ने यहां काम करने का दावा करते हुए
अपने वेतन एवं भत्तों का क्लेम किया है, उनमें से ज्यादातर का रिकॉर्ड
केडीए में उपलब्ध नहीं है। मामले की गहराई से जांच करने के निर्देश दिए गए
हैं। जल्द ही रिपोर्ट देने को कहा गया है। उस आधार पर आगे की कार्रवाई की
जाएगी।
- जयश्री भोज, उपाध्यक्ष (केडीए)