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नोटबंदी का असर गांवों में ज्यादा 

Sun, 11 Dec 2016 08:39 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर

सार

कहीं नगदी तो कहीं छोटे रुपये का संकट 
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डेमो
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विस्तार
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ग्रामीण क्षेत्रों में नोटबंदी का असर ज्यादा दिखाई दे रहा है। छानी गांव मेें इलाहाबाद बैंक संचालित है। लेकिन यहां से भी लोगों को पर्याप्त नगदी नहीं मिल पा रही है। अगर बैंक दो हजार का नोट दे देती है तो उसके खुल्ले के लिए दौड़भाग करनी पड़ती है। लोग रोजमर्रा के सामान खरीदने को लेकर परेशान हैं। सबसे अधिक परेशानी तीमारदारों को हो रही है। दुकानदार भी नया माल नहीं ला पा रहे हैं। 
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नातिन की फीस नहीं जमा कर पा रहे 
कल्ला गांव निवासी मुन्नीलाल प्रजापति भी बैंक के इर्दगिर्द घूमते मिले। पूछने पर बताया कि भइया दो हजार के नोट का फुटकर नहीं मिल रहा है। वह पूरी बाजार घूम आया है। खुल्ले रुपये न होने से राशन तक नहीं खरीद सका है। उसे नातिनों की स्कूल की फीस भी जमा करनी है। 

आपरेशन को चाहिए 50 हजार  
छानी इंटर कालेज के अध्यापक संजय वर्मा भी नोटबंदी से परेशान दिखे। कहने लगे पत्नी को पथरी है। आपरेशन कराना है। 50 हजार रुपयेे चाहिए। बैंक से नगदी नहीं मिल रही है। दर्द के कारण पत्नी बेचैन है। बैंक कर्मियों ने डीडी बनवाने की बात कही है। 
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मां का नहीं करा पा रहा इलाज  
गांव के अंदर शंकर जी के मंदिर पर बैठा बल्लू प्रजापति किसी उधेड़ बुन में दिखा। टोकने पर बोला कि नोटबंदी से बुआई लेट हो रही है। बीमार मां का भी इलाज कराना है। बैंक से सिर्फ दो हजार रुपये मिलते हैं। घर में सामान खत्म हो गया है। मांग कर गुजारा कर रहा है।

दुकान के लिए माल भी नहीं ला पाया  
गांव की मेन मार्केट में रेडीमेड कपड़ों के दुकानदार सादिक सन्नाटे में बैठे मिले। सर्दी की बात छेड़ने पर बोले कि नोटबंदी से अबकी वह गर्म कपड़े भी नहीं ला पाए हैं। बैंक से हफ्ते में एक बार सिर्फ दो हजार रुपये मिल रहे हैं। व्यापार भी घटकर 30 फीसदी रह गया है। 
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