एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल) ने गंगा किनारे स्थापित टेनरी संचालकों को बड़ी राहत दी है। ट्रिब्युनल ने कहा कि टेनरियों में जेडएलडी (जीरो लिक्विड डिस्चार्ज) सिस्टम लगाने से पहले अब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण इकाई को यह तय करना होगा कि टेनरियां लघु उद्योग में आती हैं, या बड़े उद्योगों में।
शुक्रवार को एनजीटी की चैंबर मीटिंग के दौरान चेयरमैन स्वतंत्र कुमार ने टेनरी संचालकों और अन्य उद्यमियों की शिकायतें सुनने के बाद यह फैसला दिया। एनजीटी ने सीपीसीबी (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) और उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को 10 दिन में रिपोर्ट देने को कहा है। अगली सुनवाई 22 जुलाई को होगी।
चैंबर मीटिंग में पहुंचे उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश शासन के अधिकारियों के साथ गंगा किनारे स्थापित उद्योगों से जुड़े उद्यमियों ने ट्रिब्युनल से कहा कि जेडएलडी सिस्टम टेनरियों में नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि टेनरी लघु उद्योग में आती हैं।
साथ ही सिस्टम को लगाने और उसको मेंटेन करने में खर्च भी ज्यादा आता है, इसलिए इसे रोका जाना चाहिए। इसी तरह टेनरियों में ऑनलाइन मानीटरिंग सिस्टम के लिए भी ट्रिब्युनल के सामने पहले तो जल संसाधन मंत्रालय और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जमकर वकालत की। लेकिन ट्रिब्युनल ने इस मामले में भी फिर से रिपोर्ट तैयार करने और तब तक सीपीसीबी के जरिए ही मॉनीटरिंग किए जाने को कहा।
स बीच कानपुर में गंगा किनारे बनाए जाने वाले ढाई करोड़ लीटर के सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की डीपीआर भी एनजीटी में जमा कर दी गई। माना जा रहा है कि अगली सुनवाई में कुछ तस्वीर साफ हो सकेगी। सुनवाई के दौरान जल संसाधन मंत्रालय से शशि शेखर, यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन संजीव सरन, स्माल टेनर्स एसोसिएशन से रिजवान अशरफ, नैयर जमाल, इन्वायरमेंटल सस्टेनेबल डेवलपमेंट कमेटी के असद के ईराकी सहित कई एसोसिएशन के पदाधिकारी मौजूद रहे।