विधान परिषद की सदस्यता उन्हें बसपा के जरिये मिली थी। उन्होंने अपना नोडल जनपद अपने गृह जनपद बांदा को चुन रखा था। हर वर्ष विधायक निधि की लगभग सवा करोड़ की रकम यहीं खर्च होती थी। विधान परिषद सदस्यता खत्म होने के साथ वेतन, भत्ते के अलावा विधायक निधि भी खत्म हो जाएगी।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा में एक लंबी राजनीतिक पारी खेली। इस दौरान वह मायावती के बेहद करीबी साथियों में से एक रहे।
10 मई 2017 को बसपा से निष्कासन के बाद उन्हें विधान परिषद सभापति ने असंबद्ध सदस्य के रूप में घोषित किया था। इस बीच बसपा नेताओं ने उनकी सदस्यता खत्म करने के लिए विधान परिषद सभापति को अर्जी दी। बसपा नेताओं की मांग का कोई कानूनी आधार न होने पर सभापति ने अर्जी खारिज कर दी थी। तब से अब तक लगभग 10 माह श्री सिद्दीकी असंबद्ध सदस्य के रूप में एमएलसी रहे।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी राजनीति का जहां से आगाज किया था, वहीं से दूसरी पारी की शुरुआत की है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने राजनीति की शुरुआत 1983 में यूथ कांग्रेस से की। तत्कालीन बांदा जिला युवा कांग्रेस अध्यक्ष हरीशंकर सिंह ने उन्हें बांदा तहसील युवा कांग्रेस का महामंत्री नियुक्त किया। युवा कांग्रेस में वे सक्रिय रहे।
1988 में बसपा के वजूद में आते ही नसीमुद्दीन ने नीला परचम थाम लिया। तब से लगातार बसपा में सक्रिय रहे और काफी ऊंचाइयां हासिल कीं। करीब 30 साल बाद बसपा से रिश्तों में आई खटास के बाद अब उन्होंने फिर उसी कांग्रेस का हाथ थाम लिया है, जिससे अपना सियासी सफर शुरू किया था।
नसीमुद्दीन का कहना है कि उन्होंने काफी सोच-समझकर कांग्रेस में शामिल होने का फैसला किया है। वे कार्यकर्ता के रूप में ही कांग्रेस की सेवा करेंगे। फिलहाल कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें प्रदेश में कुछ सीटों पर हो रहे उप चुनाव में प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी है। वे प्रचार में जा रहे हैं।