सिद्धार्थनगर के रहने वाले रामजीत का परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए कानपुर में रहता है। जबकि रामजीत इंदौर की एक मेटल फैक्टरी में मशीन ऑपरेटर थे। लॉकडाउन में फैक्टरी बंद हुई तो कानपुर चले आए। दो महीने जैसे-तैसे गुजारा। अब इन्हें उद्योग विभाग और लघु उद्योग भारती के प्रयास से फजलगंज में विजय मेटल फैक्टरी में नौकरी मिल गई है।
केस-2
हमीरपुर के मुंडेरा गांव निवासी महेश कुमार बीते आठ वर्ष से नोएडा में रहकर राजमिस्त्री का काम कर रहे थे। लॉकडाउन में काम छिन गया। गुजारा करना मुश्किल हुआ तो हमीरपुर चले आए। करीब 20 दिन पहले इन्हें लघु उद्योग भारती के प्रयास से कानपुर के दादा नगर में राजमिस्त्री का काम मिला है। इन दिनों ये एक फैक्टरी के निर्माण कार्य में लगे हैं। इनके साथ चार-पांच लोग और काम कर रहे हैं।
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रामजीत और महेश की तरह कानपुर और आसपास के करीब दो सौ प्रवासी श्रमिक जिले में नए रोजगार के साथ एक बार फिर अपनी जिंदगी शुरू कर चुके हैं। लेकिन हजारों प्रवासी श्रमिकों को अभी भी रोजगार का इंतजार है। जिले में प्रवासी कामगारों को रोजगार उपलब्ध कराने की रफ्तार बहुत धीमी है।
यही स्थिति रही तो शासन से मिली सूची के मुताबिक 2500 लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने में दो साल से ज्यादा समय लग जाएगा। दरअसल, औद्योगिक संगठनों लघु उद्योग भारती, इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन और उद्योग विभाग के प्रयासों के बावजूद औद्योगिक इकाइयों की ओर से श्रमिकों की मांग नहीं बताई जा रही है।
यही वजह है कि औद्योगिक इकाइयों में प्रवासी श्रमिकों का समायोजन भरपूर नहीं हो पा रहा है। जिन इकाइयों की ओर से श्रमिकों की जरूरत बताई गई है, उन्हें शासन की सूची वाले श्रमिकों में जरूरी कौशल ही नहीं मिल रहा है।
यानी श्रमिकों के नाम के सामने उनका जो काम बताया गया है, वे उससे संबंधित नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में प्रवासी श्रमिकों के रोजगार में दोतरफा व्यवधान आड़े आ रहा है। अभी तक जिन दो सौ लोगों को रोजगार मिला है, उनमें से अधिक का काम अस्थायी है। यानी दो, चार, छह महीने में जब काम पूरा हो जाएगा तो इन श्रमिकों के सामने फिर से रोजगार का संकट होगा।
इकाइयां इसलिए नहीं बता रहीं श्रमिकों की संख्या
उद्योग से जुड़े सूत्र बताते हैं कि ज्यादातर इकाइयां अपने यहां काम करने वालों की संख्या का खुलासा करने से डरती हैं। उन्हें इस बात का भय रहता है कि श्रमिकों की वास्तविक संख्या पता चलने से वे तमाम श्रम कानूनों के दायरे में आ जाएंगे। भविष्य में उन्हें न्यूनतम वेतनमान, फंड, स्वास्थ्य बीमा जैसे मानकों को पूरा करना होगा। श्रम कानून के दायरे में आने से उनका खर्चा बढ़ेगा। यही वजह है कि औद्योगिक इकाइयां सरकार को श्रमकिों की मांग नहीं बता रही हैं।
प्रशासन से श्रमिकों की जो सूची मिली है, उसमें दर्ज योग्यता के आधार पर जब किसी श्रमिक को फोन मिलाया जाता है तो वह उससे संबंधित नहीं निकलता। उद्यमी के लिए यह संभव नहीं कि वह सूची में दर्ज सभी श्रमिकों को फोन कर उनकी योग्यता पूछे। इसके बावजूद करीब सौ लोगों को रोजगार दिया जा चुका है। 10 लोगों को मैंने खुद काम दिलवाया है।- हरेंद्र मूरजानी, अध्यक्ष, लघु उद्योग भारती