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कश्मीर में उपद्रव के शिकार हुए व्यापारी परिवार

Tue, 12 Jul 2016 01:33 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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श्रीनगर एयरपोर्ट के बाहर फ्लाइट का इंतजार करते तीन दिन से फंसे शहर के अंबुज व स्वाती तिवारी साथ में पंकज सिंह व नेहा सिंह बच्चों के साथ। - फोटो : amarujala
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कानपुर। ‘कभी दुनिया की सबसे खूबसूरत झील में शुमार रही श्रीनगर की डल झील के ठीक सामने जैसे ही मेरी कार पहुंची, 15-20 उपद्रवी लड़कों ने हमें घेर लिया। पत्थर मारकर कार के शीशे चकनाचूर कर दिए।  कुछेक पत्थर अंदर आकर भी गिरे। वे गाड़ियों में आग लगाने की कोशिश कर रहे थे। हम चोटिल हुए लेकिन दहशत के मारे चीख तक नहीं निकली। टूरिस्ट कार के ड्राइवर ने उनकी मंशा भांपकर गाड़ी वापस ली और सौ की स्पीड में दौड़ा दी। 10 मिनट तक सुनसान सड़क पर कार से दौड़ते रहे। न कहीं पुलिस दिखी, न सेना के जवान। हर तरफ दहशतगर्दी का ऐसा आलम मानो धरती के स्वर्ग पर शैतानों का साया मंडरा रहा हो।’ श्रीनगर में तीन दिन तक इस खौफनाक मंजर से गुजरे शहर के दो परिवारों ने सोमवार को श्रीनगर एयरपोर्ट से फोनकर अमर उजाला को आपबीती बताई। 
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दि किराना मर्चेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अवधेश बाजपेई की बेटी स्वाती व दामाद अंबुज तिवारी वैष्णों माता के दर्शन करने जम्मू गए थे। उनके साथ श्री राम पेट्रोलियम के मालिक स्वरूप नगर निवासी पंकज सिंह, उनकी पत्नी नेहा सिंह भी अपने बच्चों संग थे। वहीं से गुलमर्ग घूमने का प्लान बना। अंबुज ने बताया कि नौ जुलाई की सुबह वे श्रीनगर पहुंचे। एयरपोर्ट पर उन्हें पता चला कि गुलमर्ग जाने के रास्ते सुरक्षा कारणों से बंद हैं। टूर कंपनी ने उन्हें श्रीनगर के हीवन होटल  में ठहराया। होटल मालिक ने उन्हें अपने जिम्मे ही बाहर निकलने की हिदायत दी। कई घंटे बीतने के बाद भी कोई कुछ बताने को तैयार नहीं हुआ तो वे खुद ही टूरिस्ट कार लेकर निकल पड़े। जैसे ही डलझील के सामने पहुंचे, उपद्रवियों का हुजूम सामने आ गया और पथराव कर कार के शीशे तोड़ दिए। अन्य टूरिस्ट गाड़ियों को भी घेर लिया। चारों ओर चीख व पथराव की आवाजें आ रही थीं। उनके निशाने पर सिर्फ टूरिस्ट ही थे। स्थानीय लोगों से वे कुछ नहीं बोल रहे थे। हिजबुल आतंकी बुरहान वानी को वे अपना आदर्श बता रहे थे। होटल पहुंचे तो पहले से ही कई टूरिस्ट घायल बैठे थे। किसी भी गाड़ी में शीशे नहीं रह गए थे। पूरा दिन वे होटल में बंद रहे। होटल मालिक कुछ भी बताने को तैयार नहीं था। पुलिस से मदद मांगी लेकिन कोई रेस्पांस नहीं मिला। किसी ने उन्हें सुबह चार बजे गुलमर्ग जाने को कहा। 10 की सुबह कुछ दूर ही आगे बढ़े थे कि फिर से आगजनी और पथराव की सूचना मिली। वे लौटे तो रास्ते में उपद्रवियों ने घेर लिया। किसी तरह बचते हुए वहां से भागे।  जगह जगह पथराव होते रहे। होटल पहुंचे तो दोबारा यहां न आने की कसम खाई। 11 जुलाई को घर लौटने के लिए सुबह पांच बजे से एयरपोर्ट के बाहर शरणार्थियों की तरह बैठे रहे। शाम साढ़े पांच बजे की फ्लाइट से वे दिल्ली पहुंचे। 
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