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क्या आपको भी लड़के करते हैं परेशान! जरूर पढ़िए इन जांबाज मर्दानियों के 'शौर्य की कहानी'

Tue, 07 Aug 2018 12:10 AM IST
पुलकित तिवारी, अमर उजाला, कानपुर

सार

- राष्ट्रस्तरीय प्रतियोगिताओं में भाग ले चुकीं खिलाड़ियों ने सड़कों पर किया शोहदों से मुकाबला
- लड़कियों से बहादुर बनने की अपील, सिर झुकाकर नहीं, सड़क अश्लीलता का दें जवाब
 
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शोहदों से भिड़ जाती हैं ये लड़कियां
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विस्तार
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मजाल है कि इनके आगे शोहदे हरकत करके निकल जाएं। बॉक्सिंग और मार्शल आर्ट ने उन्हें मुश्किलों से निपटना सिखाया। सड़क पर अश्लीलता और छेड़छाड़ पर वह सिर झुकाकर नहीं, उन्हें सबक सिखाकर मानती हैं।
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आत्मविश्वास के साथ कहती हैं कि कोई दो हाथ मारेगा तो वह उसे चार हाथ लगाएंगी। ऐसा मानना है राष्ट्रस्तरीय प्रतियोगिताओं में रजत पदक जीत चुकी महिला खिलाड़ियों का। ‘अमर उजाला’ से बातचीत में जहां वह लड़कियों से बहादुर बनने की अपील करती हैं, वहीं यह भी कहती हैं कि लक्ष्य के प्रति सजग रहना चाहिए। यही वजह है कि प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक जीतने के लिए रोज दो से चार घंटे अभ्यास की प्रेरणा मिलती है।   

छेड़छाड़ पर शोहदे को सिखाया सबक 
बीमारी के चलते पिता का निधन हो गया था। शादीशुदा सात भाई अलग-अलग रहते हैं। चार बहनों में मैं तीसरे नंबर की हूं। हम चारों एक साथ रहते हैं। केके गर्ल्स कॉलेज में थी, तब से बॉक्सिंग सीख रही हूं। एक बार गोविंद नगर में बहन के साथ दो युवकों ने छेड़छाड़ कर दी थी। बाजार में ही दोनों की जमकर पिटाई लगाई। राष्ट्रस्तरीय  छह प्रतियोगिता में हिस्सा ले चुकी हूं, तीन बार रजत पदक भी जीता है। छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और खुद भी एमए की पढ़ाई पूरी की। - अंजली वर्मा, दामोदर नगर
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नेहा वर्मा और दीक्षा की कहानी
दौड़ाकर पकड़ा और पीट दिया
2009 से बॉक्सिंग का अभ्यास कर रही हूं। जिलास्तरीय दो प्रतियोगिता खेली हैं, जिसमें रजत पदक जीता था। पिता प्राइवेट नौकरी करते हैं, घर में मां व तीन बहने हैं। एक बार डीबीएस कालेज में अभ्यास करने जा रही थी, तभी चावला मार्केट के पास लड़के ने अश्लील फब्तियां कसीं, उसे दौड़ाकर पकड़ा और जमकर पीटा। रोजाना दो से चार घंटे अभ्यास कर राष्ट्रस्तरीय प्रतियोगिता में खेलने की तैयारी कर रही हूं। पिता ने हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया है।- दीक्षा सिंह,  फजलगंज रेलवे कालोनी

संकट में डरे नहीं, धैर्य रखे
पिता मजदूरी करते हैं और परिवार में मां, दो भाई और दो बहने हैं। 2016 से ग्रीन पार्क में मार्शल आर्ट सीखना शुरू किया था। रोजाना चार से पांच घंटे तक अभ्यास करती हूं। दोस्त के साथ डीएवी कॉलेज जा रही थी, कुछ लड़के पीछा करते हुए कालेज तक पहुंच गये। मेरी दोस्त डर गयी और रोने लगी, मैंने उन लड़कों पर ईंट पत्थर से अटैक किया और एक लड़कों को पकड़ कर पीटा दिया। कभी ऐसी स्थिति आए तो लड़कियों को धैर्य नहीं खोना चाहिए।- नेहा वर्मा, फजलगंज
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डेमो पिक
शोहदों ने छेड़ा तो मैंने उसे तोड़ा
2013 में मार्शल आर्ट सीखना शुरू किया। तीन बार राष्ट्रस्तरीय प्रतियोगिता में खेल चुकी हूं। अब देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना है। अपनी फ्रैंड के साथ एक दिन कालेज जा रही थी। विजय नगर चौराहे पर एक लड़का रोककर छेड़ने लगा। मैंने उसका हाथ पकड़ कर गिरा दिया और जमकर तोड़ा। -  रिचा निवासी, विजय नगर

पिछले सात सालों के अंदर लड़कियों ने भी बॉक्सिंग और मार्शल आर्ट को सीखने में रुची ली है। इसका फायदा यह हुआ कि उनमें आत्मबल बढ़ा। अब सड़क पर गुजरने से डरती नहीं हैं। शोहदों को उनकी हरकत पर तुरंत जवाब भी देती हैं।  कुछ युवतियों कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। मुश्किल की घड़ी में उनके पैर नहीं लड़खड़ाए। बॉक्सिंग के प्रति लगन को देखकर परिजनों ने भी उनकी उत्साह बढ़ाया। - संजीव दीक्षित, बॉक्सिंग प्रशिक्षण   
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