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गुनाहों से माफी मांगने का जरिया माहे रमजान

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सिकंदरा की खजूर वाली मस्जिद में रोजा इफ्तार करते रोजेदार। - फोटो : AKBARPUR
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कानपुर देहात। मुकद्दस रमजान माह शुरू होते ही मुस्लिम समाज के लोग शिद्दत के साथ अल्लाह की इबादत कर रहे हैं। कोरोना वायरस के कारण मस्जिदों में नमाज नहीं हो पा रही है। बुधवार को रोजेदारों ने पहला रोजा रखा। शाम 6:38 बजे रोजा इफ्तार किया गया। इसके बाद मगरिव की नमाज घरों में पढ़ी गई। मंगलवार देर शाम चांद दिखते ही मुस्लिम समाज के लोगों के चेहरों पर खुशी छा गई। बुधवार को पहले रोजे पर सिकंदरा, राजपुर, सटटी, अफसरिया आदि गांवों में हर्ष उल्लास के साथ रोजदारों ने पहला रोजा रखा। कोविड गाइडलाइन के मुताबिक मस्जिदों में पांच लोगों ने नमाज अता की। सिकंदरा कस्बे की खजूर वाली मस्जिद के पेश इमाम हाफिज मुजीब रजा ने रोजे की फजीलत के बावत बताया कि रमजान का महीना खुदा से गुनाहों की माफी मांगने का जरिया है। रोजे की हालत में एक नेकी के बदले खुदा से 70 नेकियों का शबाब मिलता है। खुदा हर इंसान को रमजान के महीने में बुराईयों से रोकने का मौका देता है।
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डेरापुर की जामा मस्जिद के पेश इमाम हाफिज रजा हसन चिस्ती ने बताया कि अल्लाह ने माहे रमजान में रोजा रखने का हुक्म दिया है। जिससे गरीब व भूख-प्यास से बिलखते इंसानों के दर्द व गम का एहसास हो। जो शख्स रमजान में रोजा रखेगा। बताया कि रजमान माह को तीन हिस्सों में बांटा गया है। पहले दस दिन रहमत, बीच के दस दिन गलतियों की मगफिरत और आखिर के दस दिन जहन्नुम से निजात के लिए हैं। रोजा रखने के साथ ही गरीबों को पेट भर भोजन व असहाय लोगों की मदद करनी चाहिए।
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