आज भी शादियां पुरातन वैदिक संस्कृति पर आधारित हैं। हिन्दू धर्म की विवाह परंपरा में सात फेरे सिर्फ अग्नि कुंड की परिक्रमा ही नहीं है। हल्दी, मेहंदी व सिंदूर केवल रंगीन पदार्थ ही नहीं, कन्यादान सिर्फ एक रिवाज व परंपरा ही नहीं, बल्कि इन सबके पीछे संदेश छिपे हैं जो वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाते हैं।
कानपुर के पं. नरेंद्र शास्त्री बता रहें हैं वैवाहिक रस्मों में छिपे इन संदेशों के बारे में....
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सात फेरे के 7 वचन
1- पहले फेरे में कन्या वर से वचन मांगती है कि आप कभी भी तीर्थयात्रा करने जाएं तो मुझे साथ लेकर जाएं। साथ ही कोई व्रत-उपवास व धार्मिक कार्य करें तो मुझे अपने बाईं ओर बिठाएं।
2- दूसरे फेरे में कन्या वर से वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें।
3- तीसरे फेरे में कन्या वचन मांगती है कि आप जीवन में तीनों अवस्थाओं युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था में मेरा पालन करते रहेंगे।
4- चौथे वचन में वधू वर से कहती है कि भविष्य में परिवार की समस्त समस्याओं व आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें।
5- पांचवे फेरे में परिवार का अर्थ व महत्व समझाते हैं। साथ ही योग्य व गुणी संतान प्राप्ति की कामना करते हैं।
6- छठे फेरे में युगल लंबी, सुखी जीवन और आजीवन साथ रहने का व्रत करते हैं।
7- सातवां फेरा अंतिम फेरा होता है। जिसमें वर वधु शपथ लेते हैं कि वे सदैव एक दूसरे का सम्मान करेंगे।
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जयमाल का महत्व
प्राचीन वेद-पुराण रामायण व महाभारत जैसे ग्रंथों में कन्या स्वयंवर का आयोजन कर दूल्हे का वरण वरमाला डालकर किए जाने के अनेकों उदाहरण मौजूद हैं। जयमाल का अर्थ है माला पहनाकर वरण करना। इसलिए जयमाल के रूप में यह परंपरा आज भी विद्धमान है।
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सिंदूर व मंगलसूत्र का महत्व
हिन्दू विवाह में सिंदूर व मंगलसूत्र का खास महत्व है। ये दोनो सुहागन स्त्री की निशानी हैं। मांग में सिंदूर भरकर दूल्हा दूल्हन को आश्वासन देता है कि सदैव उसके साथ रहेगा। तीन तारों में पिरोया मंगलसूत्र पत्नी को मायके, ससुराल और पति के प्रति कर्तव्य का बोध कराता है।
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हल्दी व मेहंदी का महत्व
विवाह स पूर्व हल्दी व मेहंदी लगाने का विधान है। इसमें सौंदर्य व शुभता का भाव है। साथ ही औषधीय गुण है। जबकी मेहंदी ठंडी होती है और रच कर हांथ व पैरों को सुंदर बनाती है।
कन्यादान का महत्व
हमारे समाज में दान को पुण्य कार्य माना गया है। ये भी विवाह की महत्वपूर्ण रस्म है। माता-पिता अपने कलेजे के टुकड़े को पाल - पोस कर बड़ा करते हैं और कन्या दान कर पुण्य कमाते हैं।