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प्रदीप--1 चीन के उत्पादों पर टिका है शहर का 60 फीसदी बाजार, अब आत्म निर्भर बनने का समय

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कानपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत बनाने की घोषणा और स्वदेशी व स्थानीय उत्पादों को तरजीह देने की अपील पर अमल हुआ तो इसका सबसे अधिक फायदा शहर के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को मिलेगा। तब देश की अर्थव्यवस्था निश्चित तौर पर कृषि आधारित न होकर उद्यम आधारित हो सकती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि शहर के 60 फीसदी बाजार पर चीन के उत्पादों का कब्जा है। जाहिर है आमदनी का बड़ा हिस्सा चीन की जेब भर रहा है। व्यापारियों का तर्क है कि चीन के सस्ते उत्पादों की वजह से स्थानीय उत्पादों को तरजीह नहीं मिल पाती है। स्थानीय निर्माताओं को अब अपने उत्पादों की लागत कम करने पर पहले से अधिक कारगर नीति अपनानी होगी।
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कोरोना ने कसी लगाम
कोरोना वायरस के चलते चीन से आने वाले उत्पादों की आपूर्ति फिलहाल रुक गई है। यह ऐसा अवसर है जब लोग चीन के उत्पादों के बगैर काम चला रहे हैं। अब चीन के उत्पादों के विकल्पों की तलाश भी शुरू हो रही है। कई मामलों में उद्यमी आत्मनिर्भर बन रहे हैं। शहर में चीन के चमड़े से बने उत्पादों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक, मशीनरी, सोलर सिस्टम, मेडिकल उपकरण, सूती व सिंथेटिक कपड़ा, मसाले, धागे, रेडीमेड गारमेंट, बिजली के आइटम, मोटर वाहनों के उपकरण, प्लास्टिक, कंप्यूटर उपकरण व प्रोजेक्टर, मोबाइल फोन, उपकरण व एक्सेसरीज का बड़े पैमाने पर आयात होता है। अब शहर के कारोबारी चीन से आने वाले माल का विकल्प तलाशने में जुट गए हैं।
चीन की कंपनियों से कारोबार का मोह भंग
मेडिकल उपकरणों के आयातक संजय त्रिपाठी बताते हैं कि अब कारोबारियों का चीन की कंपनियों से कारोबार का मोह भंग हुआ है। आयात निर्यात मामलों के जानकार जफर फिरोज बताते हैं कि कानपुर में चीन से सिंथेटिक चमड़ा और गैर चमड़ा उत्पादों का आयात बहुतायत में होता है। इसमें जूते, चप्पल, वाहनों में इस्तेमाल होने वाली एसेसरीज, कपड़े, बैग, पर्स आदि शामिल हैं। शहर में हर माह करीब दो करोड़ का सिंथेटिक चमड़ा चीन से आता है। स्थानीय चमड़ा कारोबारी इस दिशा में प्रयासरत हैं कि उत्पादों में चीन के चमड़े का कम से कम इस्तेमाल हो।
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आत्मनिर्भर बन रही कंपनियां
कोरोना संकट कारोबारियों को मेक इन इंडिया सोच को बढ़ावा देने में मदद कर रहा है। दरअसल, चीन से बहुत सारे उत्पादों के आयात पर अचानक रोक लगने के बाद घरेलू कंपनियों ने अपने उत्पादों का उत्पादन बढ़ा दिया है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मेडिकल के क्षेत्र में सामने आया है। अभी तक चीन से आने वाले सर्जिकल मास्क, ग्लब्स समेत दर्जनों उत्पादों की खपत ज्यादा थी, लेकिन चीन से जब माल आ ही नहीं पा रहा है तो स्थानीय कंपनियों ने खुद ही इनका उत्पादन बढ़ा दिया। अकेले कानपुर में ही 25 कंपनियों ने पीपीई किट, मास्क व ग्लब्स का उत्पादन शुरू कर दिया है। दो महीने पहले कानपुर में एक भी पीपीई किट नहीं बनती थी। अब रोजाना 10 हजार पीपीई किट व इतने ही मास्क बनाए जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश केमिस्ट डिस्ट्रीब्यूटर एसोसिएशन के महामंत्री राजेंद्र सैनी बताते हैं कि कोरोना संकट अब जल्दी खत्म होने वाला नहीं। यह बात स्थानीय कंपनियां समझ चुकी हैं कि अब अन्य देशों से आयात बहुत संभव नहीं है। इस वजह से स्थानीय कंपनियों ने कई चीजों का उत्पादन शुरू कर दिया है। यह स्वदेशी कंपनियों के लिए खुद को साबित करने का बेहतर समय है। चीन से आयातित प्लास्टिक के घरेलू आइटम व खिलौने आदि के कारोबारी अरुण कुमार गर्ग बताते हैं कि अब बाजार में मांग और आपूर्ति का गैप स्वदेशी कंपनियों के उत्पादों से भरा जाएगा। प्लास्टिक उत्पाद बनाने वाली तमाम स्वदेशी कंपनियों ने उत्पादन बढ़ा दिया है। तमाम आयातकों ने दीपावली में आने वाले चीन के बने उत्पादों के आर्डर में कटौती कर दी है।
दूसरे देश से मंगाएं या स्वयं बनाएं, बात बराबर
केमिकल कारोबारी राजेंद्र अग्रवाल बताते हैं कि चीन से दर्जनों तरह का केमिकल आयात होता है। सबसे बड़ी जरूरत तो टेनरी संचालकों को है। चीन से आए केमिकल से ही चमड़े का शोधन होता है। केमिकल कारोबारियों के पास अधिकतम एक, डेढ़ महीने तक का स्टॉक था। इस वजह से टेनरियों को केमिकल मिलना बंद हो गया है। अन्य देशों से मंगाने पर कीमत में 20 से 25 फीसदी का इजाफा होगा। इतना ही मार्जिन स्वदेशी कंपनियों के उत्पादन में आता है। दरअसल स्वदेश में जो केमिकल 10 रुपये में बन सकता है वही चीन से मंगाने पर आठ रुपये में पड़ता है। इस वजह से स्वदेश में उत्पादकता को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा है। अब यह ऐसा दौर है जब चीन से आयात पूरी तरह ठप है, ऐसे में स्वदेशी कंपनियां महंगे उत्पादन का रिस्क ले सकती हैं।
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