छावनी विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले मुकेश यादव हों या सीसामऊ विधानसभा क्षेत्र निवासी विवेक गुप्ता इस चुनाव को मोदी पर केंद्रित मानते हैं। दोनों को ही चुनाव असल मुद्दों पर केंद्रित न होने का मलाल है। कहते हैं कि पुरानी मिलों व बड़े उद्योगों के दम पर पूरब के मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर में उद्योग घटते गए, बेरोजगारी बढ़ती गई। किदवई नगर निवासी गोपाल मिश्रा का कहना है कि हवा हो या गंगाजल अथवा भूगर्भीय पानी, प्रदूषण का ग्रहण हर आम और खास को प्रभावित कर रहा है। हालात में सुधार के वादे चुनाव में खूब होते हैं लेकिन दावे बनकर रह जाते हैं।
निर्दलीय बनर्जी पर शहर ने चार बार किया भरोसा
निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में एसएम बनर्जी ने 57, 62, 67, 71 में लोकसभा का चुनाव जीता। सन 77 में हुए चुनाव पर देश में आपातकाल का असर देखने को मिला था। जनता पार्टी से मनोहर लाल की जीत से पहली दफा कानपुर सीट निर्दलीय अथवा कांग्रेस से बाहर आई थी। पार्टी से राजाराम शास्त्री यहां जीते थे। कांग्रेस को कुल सात दफा जीत मिली। जनता पार्टी के विघटन के बाद भाजपा चार बार विजेता रही। इनमें से लगातार तीन जीत भाजपा के जगतवीर सिंह द्रोण के खाते की हैं। सन 89 के चुनाव में माकपा की सुभाषिनी अली चुनाव जीती थीं।