कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने पिछले साल अलसी की सूर्या और अन्नू नाम की नई प्रजाति विकसित की है। आनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के डॉ. महक सिंह ने बताया कि इन प्रजातियों में ओमेगा तीन फैटी एसिड 62.7 प्रतिशत पाया जाता है।
अन्य प्रजातियों में यह 50-55 प्रतिशत होता है। ये दोनों प्रजातियां पूरे देश में बोने योग्य हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश अलसी का क्षेत्रफल .28 लाख हेक्टेयर और उत्पादन 0.18 लाख मीट्रिक टन है। बुंदेलखंड क्षेत्र के किसानों को अक्तूबर के प्रथम पखवारे में और प्रदेश के बाकी क्षेत्रों के किसानों को इसकी अक्तूबर के दूसरे पखवारे में बुवाई करनी चाहिए।
उन्होंने बताया इसमें पाया जाने वाला रेशा मधुमेह, लिग्निन कैंसर और ओमेगा तीन अर्थराइटिस समेत कई बीमारियों में लाभदायक है। कोलेस्ट्रॉल भी कम करता है। सीएसए कुलपति डॉ. डीआर सिंह ने बताया अलसी के तेल का प्रयोग कैप्सूल, मिल्क केक और बेकरी उत्पादों को बनाने में भी किया जाता है।
अलसी की न्यूट्रीशनल वैल्यू
प्रोटीन 18-20 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 18-28 प्रतिशत, वसा 38 से 42 प्रतिशत, रेशा 20 से 22 प्रतिशत और विटामिंस, मिनरल के साथ एंटीआक्सीडेंट भी पाया जाता है। सीएसए द्वारा विकसित प्रजातियां : गरिमा, शुभरा, श्वेता, नीलम, पद्मिनी, शेखर, गौरव, शिखा, रश्मि, पार्वती और रुचि।