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भयंकर कुपोषण का शिकार है यूपी का यह जिला, बेटियां बोलीं-हमें चाय रोटी और भइया को दूध देती है अम्मा

रजा शास्त्री, उन्नाव Published by: प्राची प्रियम Updated Sat, 26 Dec 2020 01:58 PM IST
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कुपोषण की मार झेल रहे बच्चे - फोटो : अमर उजाला
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में बच्चे और महिलाएं कुपोषण की ऐसी मार झेल रहे हैं जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होगी। 'अमर उजाला' की टीम ने जिले के कुछ गांवों में जाकर कुपोषण का हाल जाना तो सब लोग हैरान रह गए। जिले में कुपोषित 35 हजार बच्चे हैं और अति कुपोषित साढ़े चार हजार। अतिकुपोषित में बेटियों की संख्या अधिक है। गांवों में जाकर जब बेटियों से पूछा गया तो बोलीं- 'अम्मा भइया को सुबह नाश्ते में दूध देती हैं और हमें चाय, रोटी या ब्रेड।' फल, मेवा आदि में भी बेटों की बारी पहले आती है। 

पैथर गांव की आंगनबाड़ी केंद्र प्रभारी कलावती ने बताया कि लोगों की मानसिकता ऐसी है। लोगों की काउंसलिंग भी की जाती है कि बेटों और बेटियों का बराबर ख्याल रखें। फिर भी लोग बच्चों के खानपान में फर्क कर देते हैं। बेटियों के बारे में पूछो तो लोग कहते हैं कि कुछ खाती नहीं और जब अन्नप्राशन कराते हैं तो खूब खाती हैं।


बंद रहता है आंगनबाड़ी केंद्र
कुपोषण की स्थिति देखने निकले तो हमें यह पहली तस्वीर दिखी। स्कूल चूंकि बगल में ही था तो हम वहां पहुंच गए। गेट के ठीक बगल में न्याय पंचायत संसाधन केंद्र पर ताला लगा था। पहले आंगनबाड़ी केंद्र इसी में चलता था।

बाद में वह स्कूल के अंदर एक कमरे में चलने लगा। झांक कर देखा तो बिल्कुल खाली था। दो शिक्षिकाओं का सामान उसमें रखा हुआ था। प्रधानाध्यापक मंजू लता और शिक्षिका नम्रता त्रिवेदी बोलीं कि केंद्र बंद है। आंगनबाड़ी केंद्र प्रभारी आशा कार्यकर्ता निर्मला देवी नहीं आतीं। 

जब हमने पूछा कि बच्चे नहीं आते, तो बोलीं कि कोरोना की वजह से ऑन लाइन पढ़ाई हो रही है, लेकिन ज्यादातर अभिभावकों के पास संसाधन नहीं हैं। यह पूछने पर कि फिर क्या करती हैं, उन्होंने कहा कि अभिभावकों को बुलाकर बच्चों का काम दे देते हैं। मिड डे मील का खाद्यान्न राशन के साथ दे दिया जाता है।

 
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कुपोषण की मार झेल रहे बच्चे - फोटो : अमर उजाला
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में बच्चे और महिलाएं कुपोषण की ऐसी मार झेल रहे हैं जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होगी। 'अमर उजाला' की टीम ने जिले के कुछ गांवों में जाकर कुपोषण का हाल जाना तो सब लोग हैरान रह गए। जिले में कुपोषित 35 हजार बच्चे हैं और अति कुपोषित साढ़े चार हजार। अतिकुपोषित में बेटियों की संख्या अधिक है। गांवों में जाकर जब बेटियों से पूछा गया तो बोलीं- 'अम्मा भइया को सुबह नाश्ते में दूध देती हैं और हमें चाय, रोटी या ब्रेड।' फल, मेवा आदि में भी बेटों की बारी पहले आती है। 

पैथर गांव की आंगनबाड़ी केंद्र प्रभारी कलावती ने बताया कि लोगों की मानसिकता ऐसी है। लोगों की काउंसलिंग भी की जाती है कि बेटों और बेटियों का बराबर ख्याल रखें। फिर भी लोग बच्चों के खानपान में फर्क कर देते हैं। बेटियों के बारे में पूछो तो लोग कहते हैं कि कुछ खाती नहीं और जब अन्नप्राशन कराते हैं तो खूब खाती हैं।

बंद रहता है आंगनबाड़ी केंद्र
कुपोषण की स्थिति देखने निकले तो हमें यह पहली तस्वीर दिखी। स्कूल चूंकि बगल में ही था तो हम वहां पहुंच गए। गेट के ठीक बगल में न्याय पंचायत संसाधन केंद्र पर ताला लगा था। पहले आंगनबाड़ी केंद्र इसी में चलता था।

बाद में वह स्कूल के अंदर एक कमरे में चलने लगा। झांक कर देखा तो बिल्कुल खाली था। दो शिक्षिकाओं का सामान उसमें रखा हुआ था। प्रधानाध्यापक मंजू लता और शिक्षिका नम्रता त्रिवेदी बोलीं कि केंद्र बंद है। आंगनबाड़ी केंद्र प्रभारी आशा कार्यकर्ता निर्मला देवी नहीं आतीं। 

जब हमने पूछा कि बच्चे नहीं आते, तो बोलीं कि कोरोना की वजह से ऑन लाइन पढ़ाई हो रही है, लेकिन ज्यादातर अभिभावकों के पास संसाधन नहीं हैं। यह पूछने पर कि फिर क्या करती हैं, उन्होंने कहा कि अभिभावकों को बुलाकर बच्चों का काम दे देते हैं। मिड डे मील का खाद्यान्न राशन के साथ दे दिया जाता है।

 

तीन साल की बच्ची लगती है तीन महीने की

उन्नाव के जिला महिला अस्पताल में एनीमिक माताएं और कुपोषित बच्चे - फोटो : अमर उजाला
हमें रास्ते में धूल में खेलते हुए रास्ते में बहुत से बच्चे मिले। उनमें से अधिकांश का वजन उम्र के लिहाज से कम था। सबकी फूड हैबिट बिगड़ी थी। ज्यादातर बच्चों ने बताया कि वे नाश्ते में चाय और रोटी या फिर ब्रेड खाते हैं। हालात सरैयां जैसे ही थे। 

उन्नाव के जिला अस्पताल के एनआरसी केंद्र में भी कई कुपोषित बच्चे भर्ती थे। ब्लॉक सिकंदरपुर कर्ण के बेथरगांव की रज्जन लाल की बेटी आराध्या की उम्र तीन साल है, लेकिन वह तीन महीने के बच्ची की तरह दिखती है। वह बैठ नहीं सकती है। उसमें बौनापन के साथ दुबलापन और कम वजन, यानी कुपोषण के तीनों लक्षण थे। 

दरियापुर अजगैन के इब्राहीम की ढाई साल की बेटी सिर्फ दाल-चावल खाती थी, लेकिन कुपोषण के कारण उसकी आंतें ढंग से काम न करतीं जिससे कब्ज हो गया। यहां स्टाफ ने बताया कि सभी बच्चों को न्यूट्रिएंट्स की कमी है।

20 फीसदी महिलाएं एनीमिक
जिला महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. अंजू दुबे ने बताया कि 20 फीसदी गर्भवती महिलाएं रक्त की कमी यानी एनीमिक आती हैं। पांच फीसदी को सीवियर एनीमिया रहता है। ज्यादातर गर्भवती महिलाएं घर के काम के चक्कर में नाश्ता नहीं करतीं। घर में सबसे बाद में खाना खाती हैं।

भोजन में भी सबको दाल-चावल की आदत है। इसी अस्पताल के बालरोग विशेषज्ञ ने बताया कि बच्चों को देर से खाना खिलाया जाता है जिससे वे कुपोषित हो जाते हैं। खानपान में प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की कमी रहती है।

 

जिसे बताया सबसे अच्छा, वहां बंद मिला केंद्र

पोषण पुनर्वास केंद्र में पिता की गोद मे अचलगंज की आराध्या, जिसमें कुपोषण के तीनों लक्षण हैं - फोटो : अमर उजाला
इसी दौरान जिलों के अफसर से बात हुई तो वे सबसे अच्छा सुपोषित गांव पैथर को बताने लगे। लखनऊ-कानपुर हाईवे से दाईं तरफ खलियानी घुमावदार रास्ते जैसी सड़क से हम सुपोषित गांव पैथर पहुंचे। अफसरों का दावा गलत निकला। यहां आंगनबाड़ी केंद्र बंद था। ठेकेदार ने केंद्र बना दिया लेकिन रास्ता नहीं था। इस गांव में 11 कुपोषित बच्चे दर्ज रहे हैं। इस गांव में और भी कई बच्चे कुपोषित नजर आए।

इकलौती बेटी के कुपोषण से लड़ी मां
हालांकि पैथर गांव की एक मां ने कुपोषण के खिलाफ लड़ने में अपना हौसला दिखाया। पैथर की गायत्री को शादी के 15 साल के बाद बेटी हुई थी। गर्भावस्था के दौरान खानपान सही न होने से उसकी बेटी अनन्या कुपोषित हुई। एक महीने के अंदर उसकी हालत ऐसी नाजुक हो गई की बात जीवन-मरण पर आ गई। 

अनन्या को उन्नाव के पुनर्वास केंद्र में भर्ती किया गया। उसके बाद गायत्री ने खुद आंगनबाड़ी प्रभारी कलावती से मशविरा करके उसका खानपान दुरुस्त किया। आर्थिक तंगी के बावजूद दाल, चावल, रोटी, फल, पंजीरी, दूध की व्यवस्था करके गायत्री ऐसी खानपान की व्यवस्था रखती हैं जिससे अनन्या को सारे पोषक तत्व मिल जाएं।

उन्नाव के जिला कार्यक्रम अधिकारी दुर्गेश प्रताप सिंह बताते हैं कि पोषाहार में पंजीरी बंद हो गई है। फिर से शुरुआत की जा रही है। स्वयं सहायता समूह आपूर्ति करेंगे। कुछ ब्लाकों में कुपोषित बच्चे हैं। आंगनबाड़ी प्रभारियों की काउंसलिंग कर रहे हैं कि वे जाकर लोगों को खानपान के संबंध में समझाएंगे।

 

कोरोना काल में पढ़ाई से वंचित रहे बच्चे

सिरोसी प्राइमरी स्कूल के कुपोषित बच्चे जो अक्सर नाश्ता नहीं करते - फोटो : अमर उजाला
कोराना काल में गांवों में बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पाई। ऑनलाइन पढ़ाई के लिए संसाधन की कमी के साथ ही जागरुकता नहीं रही। इसके साथ ही ऑनलाइन हेल्थ मॉनिटरिंग नहीं हो पाई। ग्रामीण ने बताया कि उन तक स्वास्थ्य विभाग की टीमें पहुंच ही नहीं पाईं। कुपोषण से संबंधित योजनाओं पर कोरोना काल में कोई काम ही नहीं हो पाया। स्कूलों में बच्चे नहीं आए तो आंगनबाड़ी केंद्र बंद रहे।
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