कानपुर के उद्योग-धंधों की स्थितियां होती जा रहीं खराब
1803 में 24 मार्च को ईस्ट इंडिया कंपनी ने ऐतिहासिक शहर कानपुर को जिला घोषित किया था। साल 1857 के गदर में कानपुर की धरती खून से लाल हुई थी। समय बीता और कानपुर एक औद्योगिक नगरी के तौर पर विकसित होने लगा। कई मिलें खुलीं इनमें लाल इमली, म्योर मिल, एल्गिन मिल, कानपुर कॉटन मिल और अथर्टन मिल काफ़ी प्रसिद्ध हुईं। इतिहास की किताबों में 'मैनचेस्टर ऑफ़ द ईस्ट' कहे जाने वाले कानपुर को न जाने किसकी नजर लग गई। अब इस शहर का हालत सबके सामने है। उद्योग धंधे चौपट हो चुके हैं।
28 वर्षीय मोहम्मद शानू भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश के पुराने औद्योगिक शहर कानपुर में रहते हैं। यही कोई 11 साल की उम्र रही होगी जब उन्होंने शहर की एक चमड़ा फैक्ट्री में काम करने के लिए स्कूल छोड़ दिया ताकि माता-पिता और चार भाई-बहनों के परिवार का सहारा बन सकें। उसके बाद आठ साल तक वे महीने में 9,000 रुपए पगार पर हर रोज आठ घंटे फैक्ट्री में काम करते रहे। इस बीच पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए लेकिन तस्वीरें देखकर नई डिजाइन के अच्छी फिटिंग वाले, मजबूत जूते बनाना जरूर सीख गए।
लेकिन इस हुनर से शादाब की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया क्योंकि जहां वे काम करते थे, वहां न कामगारों के लिए कोई चिकित्सा सुविधा थी न ही नौकरी के बाद पेंशन मिलने की संभावना।वेतन बढ़ने की भी उम्मीद नहीं थी क्योंकि उनकी फैक्ट्री ही नहीं, कमोबेश पूरा चमड़ा उद्योग तमाम कारणों से घुटने टेकने की कगार पर है। दुनिया में चमड़े के भारतीय उत्पादों की मांग कम हो रही है। वहीं राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के चाबुक का डर इस उद्योग को हमेशा बना ही रहता है। बाकी कसर ‘गाय पर होने वाली राजनीति’ पूरी कर देती है।