शहर में कौन सी मल्टीस्टोरी इमारत भूकंप से सुरक्षित है इसका सत्यापन करने के लिए केडीए के पास कोई तंत्र या तकनीकी नहीं है। इसके लिए सिर्फ संबंधित बिल्डर के दावे को सच मानने के अलावा केडीए अधिकारियों के पास कोई विकल्प नहीं है। हाल के झटकों के बाद जब भूकंपरोधी इमारतों की पड़ताल की कवायद शुरू हुई तो इसका पता चला।
ऐसी स्थिति को देखते हुए प्राधिकरण ने आईआईटी की शरण ली है। 15 मीटर से ऊंची इमारत में भूकंपरोधी तकनीकीअनिवार्य रूप लगाने का प्रावधान निर्माण उपविधि में शामिल है। वर्ष 2000 में यह नियम लागू किया गया था। ताजा भूकंप के झटकों से इस नियम पर जमी धूल की परतें हटीं तो शासन-प्रशासन को भी इसकी सुध आई।
केडीए के इंजीनियरों की फौज को फौरन छानबीन पर लगाया गया। केडीए उपाध्यक्ष ने जब इन तेजतर्रार इंजीनियरों से पूछा कि वह किस तकनीकी से जांच रहे हैं कि इमारतें भूकंपरोधी हैं तो सभी के मुंह पर ताले पड़ गए।
बाद में सभी एकसुर में बोले कि दरअसल यह तकनीकी इमारत के निर्माण के वक्त गहराई में स्थापित की जाती है, इसलिए अब यह पता करने का कोई तरीका ही नहीं है कि संबंधित बिल्डिंग में भूकंपरोधी तकनीकी लगाई गई है अथवा नहीं।
इस पर उपाध्यक्ष ने मंगलवार को आईआईटी को एक पत्र लिखकर यह पूछा है कि इमारत बनने के बाद भूकंपरोधी तकनीकी के बारे में कैसे जाना जा सकता है।
इस बारे में केडीए की उपाध्यक्ष जयश्री भोज ने कहा कि यह बात सही है कि केडीए के पास किसी इमारत के भूकंपरोधी होने या न होने की जांच करने के लिए कोई तंत्र नहीं है। इसके लिए आईआईटी से मदद के पत्र लिखा गया है। जल्द ही आवश्यक व्यवस्थाएं की जाएगी।