Kargil Vijay Diwas: 25 जुलाई को 1999 को बजौरा गांव के अमर बहादुर शहीद हुए थे। शहीद होने की सूचना मिली तो परिवार टूट गया था, लेकिन गर्व भी हुआ कि उनका बेटा मातृ भूमि की रक्षा करते शहीद हुआ।
कारगिल युद्ध में दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देते हुए 25 जुलाई 1999 को बीघापुर तहसील के बजौरा गांव निवासी वीर योद्धा अमर बहादुर सिंह शहीद हुए थे। जिस दिन अमर बहादुर शहीद हुए थे, उनका बेटा 19 दिन का था। तहसील बीघापुर के ग्राम बजौरा निवासी किसान मनमोहन सिंह के बड़े बेटे अमर बहादुर सिंह कारगिल युद्ध के समय जम्मू कश्मीर के द्रास सेक्टर में तैनात थे।
विज्ञापन
दुश्मन देश पाकिस्तान की सेना से कई दिनों तक मोर्चा लेते हुए अमर बहादुर सिंह 25 जुलाई 1999 को शहीद हो गए थे। पति की शहादत से ठीक 19 दिन पहले 6 जुलाई 1999 को फौजी अमर बहादुर की पत्नी मिथिलेश ने बेटे को जन्म दिया था। चार बेटियों पूजा, शिल्पा, प्रिया व अनीता के बाद बेटे के जन्म की सूचना पर वह काफी खुश थे, लेकिन कारिगल में युद्ध जारी होने से उन्हें छुट्टी नहीं मिल सकी थी। फोन पर परिजनों ने अमर बहादुर को बेटा होने की सूचना दी थी। शहीद के 25 वर्षीय बेटे अजय सिंह बताते हैं कि उन्होंने अपने पिता को सिर्फ फोटो और प्रतिमा में ही देखा है।
उनकी वीरता के किस्से भी परिवार वालों से सुने हैं। वह भी सेना में जाना चाहते थे, लेकिन मां और परिवार की जिम्मेदारियों ने उसके कदम रोक दिए। वह सरकार की ओर से मां के नाम स्वीकृत की गई गैस एजेंसी का संचालन कर रहे हैं। शहीद के पिता मनमोहन सिंह ने बताया कि सबसे बड़ा बेटा (अमर बहादुर) सेना में भर्ती हुआ तो सीना चौड़ा हो गया था। शहीद होने की सूचना मिली तो परिवार टूट गया था, लेकिन गर्व भी हुआ कि उनका बेटा मातृ भूमि की रक्षा करते शहीद हुआ।
विज्ञापन
सबसे छोटे भाई सेना में सूबेदार
अमर बहादुर की संतानों में से चारों बेटियों पूजा, शिल्पा, प्रिया व अनीता सिंह की शादी हो चुकी है। वीर नारी मिथिलेश कुमारी अपने ससुर मनमोहन व सास रामप्यारी की देखभाल करती हैं। संयुक्त परिवार में शहीद अमर बहादुर के तीन छोटे भाइयों में से रणबहादुर सिंह और पूर्व प्रधान राय सिंह किसान हैं। सबसे छोटे भाई रामचंद्र सिंह सेना में सूबेदार हैं।
युवाओं के लिए प्रेरणा हैं शहीद
शहीद अमर बहादुर की शहादत के बाद बजौरा गांव और क्षेत्र के युवाओं में सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने का जज्बा और बढ़ा। वर्तमान समय में गांव के बीस लोग सेना में रहकर देश की सेवा कर रहे हैं।
गांव का नहीं हुआ विकास
शहीद के बेटे अजय सिंह ने बताया कि पिता की शहादत के बाद जलनिगम ने गांव में पानी टंकी बनवाई और तत्कालीन विधान परिषद सदस्य स्व. अजीत सिंह ने अमर बहादुर के नाम से बजौरा मार्ग पर स्मृति द्वार का निर्माण कराया। समाज सेवियों ने शहीद स्मारक बनाने में सहयोग कर प्रतिमा स्थापित कराई। उनके पिता ने अपने प्राणों की आहुति देकर जिले का गौरव बढ़ाया लेकिन उनकी जन्मस्थली के विकास के लिए गांव को निर्मल ग्राम, लोहिया समग्र, ग्राम या स्मार्ट ग्राम में शामिल नहीं किया गया। परिवार को पांच बीघा जमीन, और प्रशासन व तत्कालीन जनप्रतिनिधियों ने बिहार-सरेनी मार्ग, गांव के विद्यालय, लोन नदी पुल व पानी की टंकी का नामकरण शहीद के नाम पर करने की घोषणा पूरी नहीं हुई।