कानपुर की तवारीख (इतिहास) में दर्ज कुछ ऐसी बातें, कुछ ऐसे शख्स हैं, जो भाईचारे का उजियारा फैलाते रहे और जो वाकई काबिल-ए-तारीफ हैं। उनसे सीख लेकर सवाब (पुण्य) का हकदार बना जा सकता है।
आइए गौर फरमाते हैं...
मसजिद को फिर संवारने के लिए जुटा था ब्राह्मण परिवार
कानपुर में हरबंश मोहाल स्थित हयात मसजिद को शहर की ऐतिहासिक मसजिद माना जा सकता है। यह शहर के बदलते हुलिये की गवाह है। सन् 1931 में कुछ अराजक तत्वों ने इस मसजिद के एक दरवाजे में आग लगा दी, तो पड़ोस में रहने वाला ब्राह्मण परिवार वहां आ गया। उस परिवार के सदस्यों ने न सिर्फ फौरन आग बुझाई, बल्कि आसपास रहने वाले हिंदू परिवारों को इकट्ठा कर उन उपद्रवियों को वहां से खदेड़ भी दिया।
बाद में उसी ब्राह्मण परिवार ने जले हुए दरवाजे को बदलवाने में आर्थिक सहयोग भी दिया। इस मसजिद के इमाम अब्दुल कुद्दूस खान का कहना है कि यह मसजिद सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल है। हयात साहब ने मुसाफिरों के मुफ्त ठहरने के लिए एक सराय भी बनवाई थी।
जंगल-मंगल की मसजिद
नई मसजिद, मोतीमोहाल का निर्माण सन् 1903 में हुआ था। कानपुर के इतिहास पर काम करने वाली संस्था ‘कानपुरीयम’ की स्मारिका के एक लेखानुसार, पुराने दस्तावेजों से पता चलता है कि इस मसजिद का निर्माण जंगल पुत्र खैराती ने अपने बाबा मंगल की इच्छा पर कराया था। इसी वजह से पुराने लोग इसे जंगल-मंगल की मसजिद भी कहते थे। इस मसजिद की देखरेख अब एक कमेटी करती है। इसमें बच्चों को अरबी की शिक्षा देने का भी इंतजाम है।
जाति-धर्म को पीछे कर मुसाफिरों को ठौर-कौर देती थीं मसजिदें
कानपुर। शहर की कई ऐसी मसजिदें हैं, जिनमें बाहर से कोई भी थका-हारा मुसाफिर आता था, तो उससे धर्म-जाति नहीं पूछी जाती थी, बल्कि उसे मेहमान समझकर ठौर दिया जाता था और खाना भी।
दुलारी मसजिद में दुआ-दवा
मूलगंज की रोटी वाली गली की दुलारी मसजिद (खानकाह हुसैनिया) न केवल कानपुर, बल्कि संपूर्ण भारत में अपने ढंग की इकलौती बताई जाती है। इसके पीछे कारण यह है कि इसे मुकद्दस मदीना की विश्वविख्यात मसजिद-ए-नबवी की तर्ज पर बनाया गया है। मशहूर शायर मौलाना हसरत मोहानी और हलीम साहब का निवास इस मसजिद के पास ही था। इस मसजिद के आंगन में फकीर शाह गुलाम हुसैन साहब रहमतुल्ला अलैह की मजार है।
वह मदीना जाने के बाद जब लौटे, तो हमेशा के लिए इस मसजिद में ही रुक गए। यह कहा जाता है कि गुलाम हुसैन साहब सबके लिए दुआ तो करते ही थे, साथ में दवा भी देते थे। उनकी दुआ और दवा से सब चंगे हो जाते थे। उनसे दवा लेने हर धर्म के लोग पहुंचते थे। साथ ही इस मसजिद में मुसाफिरों को रहने के लिए ठौर तो मिलता ही था और खाना भी, फिर वह चाहे किसी भी धर्म का हो।
गड़रिया मोहाल मसजिद
खपरा मोहाल से हूलागंज की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित लगभग 150 साल पुरानी इस मसजिद का निर्माण सब्जी व्यापारी दावर बख्श ने कराया था। इसमें भी हर धर्म-संप्रदाय के मुसाफिरों को रहने के लिए ठौर मिल जाता था।