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यूपीसीडा भर्ती घोटाला: 18 साल में 33 बार जांच, कार्रवाई सिर्फ सात पर, कई हो चुके हैं सेवानिवृत्त, पढ़ें मामला

Fri, 09 Oct 2026 08:59 AM IST
Himanshu Awasthi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: कानपुर स्थित यूपीसीडा के वर्ष 2008-09 बैकलॉग भर्ती घोटाले में 18 साल बीतने और 33 से अधिक बार जांच होने के बाद भी ठोस कार्रवाई महज सात कर्मचारियों तक सीमित है। प्रमुख सचिव, कमिश्नर और विजिलेंस स्तर की जांचों में फर्जी प्रमाणपत्रों और अवैध पदोन्नति का पर्दाफाश होने के बावजूद मामला फाइलों के चक्कर में दबा हुआ है, जबकि कई संलिप्त कर्मचारी सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं।
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यूपीसीडा भर्ती घोटाला - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कानपुर में यूपीसीडा के वर्ष 2008-09 के बैकलॉग भर्ती घोटाले की जांच 18 साल में 33 से ज्यादा बार हो चुकी है, लेकिन कार्रवाई अब तक सिर्फ सात अधिकारियों-कर्मचारियों तक सीमित है। इस दौरान कमिश्नर व कमिश्नर स्तर के सात अधिकारियों, दो प्रमुख सचिव और तीन विशेष सचिव समेत कई स्तरों पर जांच हुई। अलग-अलग रिपोर्टों में जिम्मेदारों की भूमिका सामने आने के बावजूद मामला कार्रवाई की बजाय फाइलों के फेर में उलझा रहा।

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इस बीच भर्ती हुए कई कर्मचारी सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। यूपीसीडा के तत्कालीन स्वरूप यूपीएसआईडीसी में 129 पदों पर हुई भर्ती में कई अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए थे। तत्कालीन श्रमायुक्त रणवीर प्रसाद की पहली जांच रिपोर्ट में 12 अधिकारियों के प्रमाणपत्र फर्जी बताए गए और मामले को गंभीर आपराधिक प्रकरण बताया गया। वर्ष 2017 की मंडलायुक्त की जांच में भी कार्रवाई की संस्तुति की गई थी।

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फर्जी प्रमाणपत्र पर प्रमोशन का आरोप
अब तक सात कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया, जिनमें दो को न्यायालय से बहाली मिल चुकी है। मामले की विजिलेंस जांच पहले भी हो चुकी है। वर्ष 2023 में दोबारा विजिलेंस को जांच सौंपी गई। इसके अलावा औद्योगिक विकास सचिव और अपर आयुक्त कानपुर मंडल ने भी जांच की। शिकायत के मुताबिक, कुछ कर्मचारियों ने फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी हासिल करने के बाद पदोन्नति भी पाई। इनमें सात के अवर अभियंता बनने का आरोप है। शिकायत के बाद जांच शुरू हुई, लेकिन कार्रवाई अब तक लंबित है।

तीन सेवानिवृत्त अफसरों पर एफआईआर
बसपा शासनकाल में वर्ष 2008-09 में हुई यूपीसीडा (तत्कालीन उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम) की भर्ती में कथित घोटाले का मामला करीब 18 साल बाद फिर खुल गया है। विजिलेंस की जांच में भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप सही पाए जाने के बाद शासन के निर्देश पर तीन तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।

बसपा शासनकाल में मांगे गए थे आवेदन
आरोपियों में सेवानिवृत्त हो चुके अधीक्षण अभियंता/प्रबंधक (कार्मिक) व ओएसडी अजीत सिंह, संयुक्त प्रबंध निदेशक तपेंद्र प्रसाद और सहायक प्रबंधक (कार्मिक) सुधीर कनौजिया शामिल हैं। बसपा शासनकाल में बैकलॉग के रिक्त पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मांगे गए थे। उस समय संस्था यूपीसीडा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम के नाम से संचालित थी।

फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर दी गई नौकरी
आरोप है कि स्वीकृत 129 पदों के सापेक्ष नियमों को दरकिनार कर 19 अतिरिक्त नियुक्तियां कर दी गईं। इसके अलावा 17 अभ्यर्थियों को कथित तौर पर फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी दी गई। क्रीमी लेयर में आने वाले करीब आधा दर्जन अभ्यर्थियों को भी आरक्षण का लाभ दिए जाने का आरोप है। भर्ती प्रक्रिया में मानचित्रकार, आशुलिपिक (टंकण), उप प्रबंधक (लेखा), उप प्रबंधक (सामान्य) और सहायक प्रबंधक (लेखा) समेत विभिन्न पदों पर नियमों की अनदेखी और कूटरचित दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप लगे हैं।
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2012 में सामने आया था मामला
भर्ती घोटाला वर्ष 2012 में सामने आया था। इसके बाद मामले की जांच कई बार शुरू हुई और बंद होती रही। अब शासन के निर्देश पर कानपुर विजिलेंस ने जांच आगे बढ़ाई है। विजिलेंस टीम भर्ती से जुड़े अभिलेखों और अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल कर रही है। एसपी विजिलेंस वैभव पांडेय ने बताया कि जांच में आरोप सही पाए गए हैं। एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है। आरोपी वर्तमान में कहां हैं, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है।
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