राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार झींझक स्टेशन पहुंचे रामनाथ कोविंद अपने आध्यात्मिक गुरु बाबूराम बाजपेई और मित्र रामविलास त्रिपाठी को मंच से याद करना नहीं भूले। कोरोना महामारी में उन्हें खोने का दुख जताते हुए वह भावुक हो गए। श्रद्धांजलि देकर उनके आदर्शों पर चलने की प्रेरणा दी।
झींझक निवासी अंजनी लल्लन शरण बाजपेई ने बताया कि पिता दिवंगत बाबूराम बाजपेई राष्ट्रपति के आध्यात्मिक गुरु थे। यादें साझा करते हुए बताया कि तीन साल की उम्र में राष्ट्रपति की मां कलावती का निधन हो गया था। उस दौरान पिता पड़ोस में ही रहते थे। मां के न होने पर कोविंद के पालन का जिम्मा उनकी दादी ने लिया था।
इसके बाद वह पिता दिवंगत बाबूलाल के संपर्क मेें आ गए। शुरुआत से ही अध्यात्म में रुचि होने के कारण वह घंटों बातें किया करते। कोविंद ने उन्हीं से अध्यात्म का पाठ पढ़ा। उनके राज्यसभा सदस्य रहने के दौरान भी एक-दूसरे के घर दोनों का आनाजाना लगा रहा। बिहार का राज्यपाल और राष्ट्रपति बनने पर शपथ ग्रहण समारोह में भी उन्होंने बाबूराम बाजपेई को बुलाया था।
अंजनी लल्लन शरण ने बताया कि एक मई को पिता बाबूराम बाजपेई का निधन हो गया था। जानकारी पर राष्ट्रपति ने शोक संदेश भेजा था। झींझक में राष्ट्रपति द्वारा अपने आध्यात्मिक गुरु का जिक्र मंच से करने पर उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। कहा कि राष्ट्रपति ने आज भी उनके परिवार को याद रखा है यह बड़ी बात है।