कानपुर में तलाक, रिश्तों में दरार और महिलाओं और बच्चों के भरण-पोषण (नफका) से जुड़े मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अपने और मासूम बच्चों के हक के लिए महिलाएं शरई अदालत का दरवाजा खटखटा रही हैं। सुन्नी दारुलकजा, मोहकमा-ए-शरिया दारुलकजा व काउंसलिंग सेटंर्स से मिले आंकड़ों के अनुसार शहर में हर महीने औसतन 30 ऐसे मामले शरई अदालत पहुंच रहे हैं। कई मामलों में तो पतियों ने इद्दत की अवधि के दौरान भी पत्नी का जायज खर्च नहीं उठाया। शरई अदालत में काजी और काउंसलर्स दोनों पक्षों को बुलाकर शरीअत के मुताबिक फैसला कराने की कोशिश कर रहे हैं।
पुरुषों में जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। शरीअत में पत्नी और बच्चों का नफका देना पति का फर्ज माना गया है। इसके बावजूद महिलाओं को अपने ही हक के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। -कारी सगीर आलम हबीबी, नायब शहर काजी सुन्नी दारुलकजा रजबी रोड
शरई अदालत ऐसे मामलों में आपसी सहमति और काउंसलिंग के जरिए महिलाओं को हक दिलाने का प्रयास किया जाता है। इस तरह के मामले हर महीने आ रहे हैं, जिसमें आपसी सहमति से निपटारा कराया जाता है। -मुफ्ती अब्दुल रशीद, अध्यक्ष दारुलकजा