प्रसिद्ध गायिका रहीं बेगम अख्तर की जिंदगी पर बनी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त बॉयोपिक ‘जिक्र उस परिवश का’ के प्रदर्शन से फेस्टिवल की शुरुआत हुई। 63 मिनट की फिल्म ने अख्तरी बाई फैजाबादी से उनकी गायकी से बेगम अख्तर बनने और लखनऊ के मशहूर घराने के बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी से शादी तक के सफर को छुआ। फिल्म के निर्देशक निर्मल चंदर ने फिल्म से जुड़े पहलुओं के बारे में बताया। लखनऊ में एडीसीपी चिरंजीव सिन्हा, फिल्म निर्देशक निर्मल चंदर, डॉक्टर राहुल गोयल, डॉक्टर आलोक बाजपेई, लेखक अशोक लाल, डॉक्टर संजय गर्ग, सरबजीत सिंह बहल ने दीप जलाकर उद्घाटन किया। फेस्टिवल डायरेक्टर अंजली तिवारी ने बताया कि पांच साल पहले शुरू हुआ यह फेस्टिवल दिन प्रतिदिन लोकप्रिय हो रहा है।
आजादी के दीवानों को किया याद
आईपीएस ऑफिसर चिरंजीव सिन्हा के आजादी की लड़ाई के भूले बिसरे दीवानों की कुर्बानियों की कहानियों के संकलन पर चर्चा पर चर्चा हुई। उनके संकलन में 1550 में पुर्तगालियों के भारत पर कब्जे से लेकर अंग्रेजों के कब्जे तक और देश की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले भूले बिसरे 150 नायक-नायिकाओं के किस्से हैं। इसमें कानपुर की अजीजन बाई और मैनादेवी की कहानियां प्रमुख रहीं। कौटिल्य प्रकाशन से प्रकाशित शायर अशोक लाल की किताब रोशनाई और कवि अक्षय कुमार सिंह चौहान की किताब आह का विमोचन हुआ। विमोचन चिरंजीव सिन्हा, डॉक्टर अनिल त्रिवेदी, जहांगीर, राजू अरोड़ा, अतुल तिवारी ने किया।
अपना हथियार अब अदब होगा
अपना हथियार अब अदब होगा, अब न होगा तो कब होगा। कवि अशोक लाल की इस कविता से उनका परिचय कराने वाली कवयित्री भावना मिश्रा ने उनसे बातचीत के सत्र की शुरुआत की। अशोक लाल ने अपनी किताब रोशनाई से कुछ कविताएं सुनाईं। उन्होंने पहला शेर आठ साल की उम्र में लिखा था।
कुतबी ब्रदर्स की कव्वाली पर झूमे श्रोता
पहले दिन का सत्र कुतबी ब्रदर्स की सूफी कव्वाली के बाद समाप्त हुआ। दिल्ली से आए कुतबी ब्रदर्स का परिवार कव्वाली गायन में लगभग 600 साल से है।