कानपुर। लगातार हो रही आत्महत्याओं के चलते आईआईटी कानपुर एक बार फिर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सवालों के घेरे में है। पिछले दो वर्षों में परिसर में नौ छात्रों की मौत से न केवल वर्तमान बल्कि पूर्व छात्र भी चिंतित हैं। ग्लोबल आईआईटी एलुमनी सपोर्ट ग्रुप के आंकड़ों के अनुसार इसी अवधि में देशभर के आईआईटी में हुई छात्र मौतों में से करीब 30 प्रतिशत मामले अकेले आईआईटी कानपुर से जुड़े हैं। यह सभी आईआईटी में सर्वाधिक हैं। पूर्व छात्रों का कहना है कि संस्थान के अधिकारियों से इस बाबत मीटिंग कर समाधान के रास्ते खोजे जाएंगे।
एलुमनी ग्रुप का कहना है कि यह स्थिति संस्थागत स्तर पर गंभीर चूक की ओर इशारा करती है। घटनाएं स्नातक, परास्नातक और शोध कार्यक्रमों से जुड़े छात्रों से जुड़ी हैं। हर मामले के बाद संस्थान की ओर से कारणों को व्यक्तिगत बताया जाता रहा है, लेकिन यह समस्या कहीं अधिक गहरी है। आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र और ग्लोबल आईआईटी एलुमनी सपोर्ट ग्रुप के संस्थापक धीरज सिंह (2004 बैच) ने बताया कि दो सालों में जहां आईआईटी कानपुर में नौ छात्रों ने आत्महत्या की वहीं आईआईटी खड़गपुर में यह संख्या सात रही। आईआईटी बांबे में एक छात्र ने यह कदम उठाया। आईआईटी मद्रास में ऐसी घटना नहीं हुई, जबकि इन संस्थानों में छात्रों की संख्या कहीं अधिक है।
उन्होंने कहा कि लगातार सामने आ रही घटनाएं संस्थान की मानसिक स्वास्थ्य नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। उन्होंने शिक्षा मंत्रालय से मांग की कि आईआईटी कानपुर में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति को देखते हुए संस्थान के शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय की जाए और हालात सुधारने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। एलुमनी और छात्र संगठनों का कहना है कि जब तक मानसिक स्वास्थ्य को केवल व्यक्तिगत समस्या मानने के बजाय संस्थागत जिम्मेदारी के रूप में नहीं लिया जाएगा, तब तक हालात में सुधार मुश्किल है।