वर्चुअल ऑटिज्म के बाल रोगियों संख्या बढ़ रही
यह स्क्रीन का लती होने का दुष्प्रभाव है। इसकी वजह से बच्चों में सामाजिक बर्ताव का तरीका विकसित नहीं हो पाया। बाल मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. कृतिका चावला ने बताया कि वर्चुअल ऑटिज्म के बाल रोगियों संख्या बढ़ रही है। हिस्ट्री से पता चलता है कि मां-बाप बच्चे को फोन दे देते हैं, जिससे वे रोएं नहीं खेलते रहें।
मस्तिष्क पर स्क्रीन का प्रतिकूल प्रभाव
ये मां-बाप खुद भी स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। बच्चों के मस्तिष्क पर स्क्रीन का प्रतिकूल प्रभाव आया है। बच्चे अब मोबाइल स्क्रीन पर जो देखते हैं, उसी पर प्रतिक्रिया देते हैं। अगर घर का सदस्य बुलाता है, तो गुमसुम रहते हैं जैसे कुछ सुन नहीं रहे। उन्होंने बताया कि यही आयु बच्चे के मस्तिष्क के विकास की होती है।
सोशलाइजेशन की प्रक्रिया होने लगती है बाधित
इसी उम्र में उसकी फूड हैबिट पड़ती है। भाषा और लोगों को प्रतिक्रिया देना सीखता है लेकिन वर्चुअल ऑटिज्म की स्थिति आने के बाद बच्चे अपने संवेदी (सेंसुअरी) अंगों का इस्तेमाल ही बंद कर देते हैं। आसपास की चीजों से खुद को जोड़ नहीं पाते। उनके मस्तिष्क का विकास अलग तरह से होने लगता है। सोशलाइजेशन की प्रक्रिया बाधित होने लगती है।
बड़े बच्चों में बढ़ रहा इंटरनेट सिंड्रोम
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. आयुषी सिंह ने बताया कि आठ से 16 साल आयु वर्ग के बच्चों में इंटरनेट सिंड्रोम बढ़ रहा है। छोटी-छोटी रील देखने की आदत पड़ने पर बच्चे लंबे समय तक स्कूल में व्याख्यान नहीं सुन पा रहे। पुस्तकों में लंबे अध्याय भी नहीं पढ़ पाते। इससे उनकी कम्युनिकेशन स्किल बाधित हो रही। साथ ही चिड़चिड़ापन, छोटी बात पर अत्याधिक क्रोध आने के लक्षण पैदा हो रहे हैं। रील देखने में उनमें न्यूरो केमिकल डोपामीन का अधिक रिसाव हो जा रहा है। इससे उन्हें खुशी मिलती है जिससे लत पड़ जाती है। विभाग में एक साल में 50 बच्चों का परीक्षण किया गया है।