फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

UP: गर्दन की नस से बैलून डालकर फुला रहे दिल का वाॅल्व, प्रदेश में सिर्फ LPS कार्डियोलॉजी में अपनाई जा रही विधि

Tue, 27 Jan 2026 05:36 AM IST
हिमांशु अवस्थी रजा शास्त्री, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: एलपीएस कार्डियोलॉजी कानपुर के डॉ. एसके सिन्हा ने गर्दन की नस से हृदय वाल्व ठीक करने की तकनीक में सफलता पाई है। यह विधि जांघ की नस की विकृति वाले मरीजों और गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित है।
विज्ञापन
एलपीएस कार्डियोलॉजी - फोटो : amar ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कानपुर में गर्दन की नस से बैलून डालकर हृदय रोगियों का वाॅल्व फुला दिया जा रहा है। इससे रोगी सर्जरी से बच जाता है। दर्द और रक्तस्राव भी नहीं होता। रोगी की रिकवरी जल्दी हो जाती है। हृदय के वाॅल्व के इलाज में ट्रांसजुगुलर बलून मिट्रल वाल्वुलोटोमी नामक यह विधि प्रदेश में अभी एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में ही अपनाई जा रही है। जर्नल ऑफ अमेरिकन कार्डियोलॉजी ने इस विधि संबंधी शोध प्रकाशित किया है।

विज्ञापन

गर्दन की नस से ट्रांसजुगुलर बलून मिट्रल वाल्वुलोटोमी कराने में सबसे राहत उन रोगियों को है जिनकी जांघ की नसों में पतलापन और जन्मजात विकृति होती है। इसके अलावा स्पाइनल कॉर्ड के रोगियों और विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं के इलाज में कोई दिक्कत नहीं होती। उनकी ट्रांसजुगुलर बलून मिट्रल वाल्वुलोटोमी प्रक्रिया सुरक्षित रहती है। ऐसे रोगियों को जांघ की नस से बैलून डालने में जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं जिससे जान का खतरा रहता है।

प्रदेश में इस विधि से इलाज सिर्फ कार्डियोलॉजी में
इंस्टीट्यूट के कार्डियोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. एसके सिन्हा ने बताया कि दो साल में 50 रोगियों की ट्रांसजुगुलर बलून मिट्रल वाल्वुलोटोमी की गई है। इनमें 18 रोगियों के ब्योरे संबंधी शोध जर्नल ऑफ अमेरिकन कार्डियोलॉजी में वर्ष 2025 में प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने बताया कि देश में अभी चार-पांच शहरों में यह विधि अपनाई जा रही है। प्रदेश में इस विधि से इलाज सिर्फ कार्डियोलॉजी में किया जा रहा है।
विज्ञापन

विधि के फायदे

  • शारीरिक जटिलताओं यह उन रोगियों के लिए सबसे बड़ा विकल्प है जिनमें पैर की नसों में रुकावट या कोई जन्मजात विकृति हो।
  •  गर्दन की नस (जुगुलर वेन) के माध्यम से माइट्रल वाल्व तक पहुंचने का रास्ता अधिक सीधा होता है। इससे वाॅल्व को पार करना कभी-कभी पारंपरिक तरीके की तुलना में आसान और तेज हो सकता है।
  • जिन रोगियों को गंभीर काइफोस्कोलियोसिस (रीढ़ की हड्डी का टेढ़ापन) है, उनके लिए पारंपरिक बीएमवी करना असंभव हो सकता है। ऐसे मामलों में ट्रांसजुगुलर तरीका एक सफल विकल्प साबित होता है।
  • त्वरित गतिशीलता पैर के बजाय गर्दन के रास्ते प्रक्रिया होने के कारण मरीज प्रक्रिया के बाद बहुत जल्दी चलने-फिरने में सक्षम हो जाता है।
  • यह तकनीक एक साथ माइट्रल और ट्राइकसपिड वाॅल्व दोनों की मरम्मत करने के लिए भी प्रभावी मानी जाती है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें