मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल करने वालों को सोते में भी रिंगटोन सुनाई पड़ रही है। हालांकि फोन बजता नहीं है लेकिन इस भ्रम की वजह से लोगों की नींद बीच में टूट जाती है और वे फोन उठाकर देखने लगते हैं तो पता चलता है कि रिंगटोन बजी ही नहीं। ऐसे लोगों के दिमाग पर भारीपन रहता है। याददाश्त सुस्त हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या को फैंटम रिंगटोन सिंड्रोम रहते हैं। रोगी हैलट के मनोरोग विभाग की ओपीडी में आकर दिक्कत बता रहे हैं। उनका भावनात्मक बर्ताव भी बदल रहा है।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज का मनोरोग विभाग ऐसे लोगों का आंकड़ा इकट्ठा कर रहा है। इनकी हिस्ट्री का अध्ययन किया जाएगा ताकि उनके व्यक्तित्व पर आने वाले अन्य प्रभावों की भी जानकारी हो सके। फैंटम रिंगटोन सिंड्रोम के रोगियों में 18 से लेकर 50 वर्ष आयु वर्ग के लोग अधिक हैं। दो साल में 150 रोगियों को सैंपल सर्वे में शामिल किया गया है। इनमें 45 महिलाएं हैं और 105 पुरुष हैं। इनमें ज्यादातर नींद न आने, उलझन, घबराहट की दिक्कत होने पर अस्पताल आए थे।