गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में की गई है जांच
टीम ने इंडक्टिवली कपल्ड प्लाज्मा-ऑप्टिकल एमिशन स्पेक्ट्रोस्कोपी (आईसीपी-ओईएस) तकनीक का उपयोग कर परीक्षण किया। शोध टीम में नलिनी द्विवेदी, शिखा सिंह, डॉ. सीमा परोहा शामिल रहे। टीम की रिपोर्ट के अनुसार नदी के जल में आर्सेनिक, कैडमियम, कोबाल्ट, क्रोमियम, सीसा और थैलियम की सांद्रता अधिक पाई गई है। प्रो. वर्षा गुप्ता ने बताया कि जांच गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में की गई है।
जीवों के शरीर में प्रवेश करती हैं खतरनाक धातुएं
रोहू मछली के यकृत, गुर्दा, आंत व गलफड़े में यह धातुएं मिली हैं। कम जल प्रवाह और उच्च वाष्पीकरण दर के कारण गर्मियों में इन धातुओं की मात्रा अधिक मिली है। गुर्दे और यकृत में सर्वाधिक संचय मिला है, क्योंकि यह अंग विषाक्त पदार्थों के निष्कासन व संग्रहण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। प्रो. वर्षा गुप्ता ने बताया कि शोध से पता चला है कि जल स्रोतों में मौजूद खतरनाक धातुएं जीवों के शरीर में प्रवेश करती हैं।
समाज हित के शोध कार्य देखने को मिलेंगे
जो आगे खाद्य शृंखला को प्रभावित कर सकती हैं। भारी धातुओं की उपस्थिति का आंकलन सिर्फ जल की सतही गुणवत्ता (डब्ल्यूक्यूआई) से नहीं किया जा सकता। ऐसे प्रदूषकों को जल निगरानी कार्यक्रम में शामिल करना जरूरी है। वहीं, कुलपति प्रो. विनय पाठक ने रिसर्च पर प्रशंसा जाहिर की। उन्होंने कहा कि शोध ऐसा हो जो समाज के हित में हो। विवि शोध को हमेशा से बढ़ावा देता आया है। आने वाले समय में हर विभाग में समाज हित के शोध कार्य देखने को मिलेंगे।
आर्सेनिक, कैडमियम, कोबाल्ड, कोमियम आदि हैवी मेटल्स हैं। इनके शरीर में जाने से अस्थि मज्जा के रोग, ब्लड कैंसर, एप्लास्टिक एनीमिया का खतरा रहता है। इसके साथ ये धातुओं के शरीर में जाने से गुर्दा खराब होता है और लिवर सिरोसिस हो सकता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है और बुढ़ापा जल्दी आता है। -डॉ. एमपी सिंह, सीनियर फिजीशियन, मेडिसिन विभाग, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज