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रोगियों की दलाली: जेब का ऑक्सीजन लेवल देख रहे निजी अस्पताल, जिनकी जेब गर्म नहीं, उनके लिए होता है सिर्फ बहाना

Tue, 27 Apr 2021 11:37 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

निजी अस्पतालों की व्यवस्था ने एकीकृत कोविड कमांड सेंटर की व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। कमांड सेंटर से रोगियों को जिन अस्पतालों में भर्ती करने के लिए भेजा जाता है, वो भटकते रहते हैं।
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कोरोना काल में हो रहा मरीजों की जान से खिलवाड़ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कोविड स्टेटस पाने वाले और अन्य निजी अस्पतालों में मरीजों को भर्ती करने में आनाकानी जानलेवा साबित हो रही है। निजी अस्पताल संचालक तीमारदारों की जेब टटोलकर रोगियों को भर्ती कर रहे हैं। इसमें निजी एंबुलेंस वालों की दलाली सामने आई है।
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सीएमओ डॉ. अनिल मिश्रा खुद दो निजी अस्पतालों को इस संबंध में नोटिस दे चुके हैं। अस्पताल ने कमांड सेंटर से भेजे गए मरीजों को खड़ा रखा और निजी एंबुलेंस से आए रोगियों को तुरंत भर्ती कर लिया था। निजी अस्पतालों की व्यवस्था ने एकीकृत कोविड कमांड सेंटर की व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।

कमांड सेंटर से रोगियों को जिन अस्पतालों में भर्ती करने के लिए भेजा जाता है, वो भटकते रहते हैं। बेड खाली न होने का बहाना करके मरीजों को हैलट जाने के लिए कहा जाता है। अब जब शासन ने व्यवस्था कर दी है कि बिना कमांड सेंटर के प्रपत्र के ही निजी अस्पताल भर्ती करेंगे, तब भी व्यवस्था वैसी ही है।
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एक निजी अस्पताल के संचालक ने 50 फीसदी ऑक्सीजन लेवल वाले रोगी को भर्ती करने से मना कर दिया, जबकि उसे इसके अलावा और कोई जटिलता नहीं थी। सीएमओ का कहना है कि जहां से गड़बड़ी पता चल रही है, उसके खिलाफ जांच करके कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई है।

बेड की व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं
कोविड अस्पतालों की बेड की व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं है। अब भी स्पष्ट नहीं रहता है कि किस अस्पताल में कितने बेड खाली हैं। सीएमओ की सुबह की रिपोर्ट के मुताबिक कोविड स्टेटस वाले 25 अस्पतालों में कुल उपलब्ध बेड की संख्या 2815 है। इनमें 2584 तो भरे थे, लेकिन 231 बेड खाली थे। इसके बावजूद रोगी भटककर लौट गए। वहीं कई को इलाज नहीं मिलने से उनकी जान चली गई। रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार सुबह तक हैलट में 28, रामा मेडिकल कॉलेज में 198 और कांशीराम अस्पताल में पांच बेड खाली थे।

बुजुर्ग को बेड, रिटायर्ट शिक्षक को ऑक्सीजन नहीं
गोविंदनगर में रहने वाले आदर्श भाटिया (64) का ऑक्सीजन लेवल अचानक से कम होने लगा। परिजन उन्हें लेकर अस्पताल भागे, जहां जवाब मिला इन्हें वेंटिलेटर की जरूरत है। ऑक्सीजन न होने से वेंटिलेटर बंद है। अन्य अस्पतालों से भी यही जवाब मिला। दौड़भाग के दौरान ही उन्होंने दम तोड़ दिया। यही हाल जय नारायण विद्या मंदिर के रिटायर्ड शिक्षक माता प्रसाद का हुआ। वह कोरोना संक्रमित थे। परिजनों और साथी शिक्षकों का आरोप है कि उन्हें अस्पताल तो मिल गया पर ऑक्सीजन सुचारु रूप से नहीं मिली, जिससे उनकी भी मौत हो गई।

जद्दोजहद के बाद मिला बेड, कुछ ही देर में मौत
कल्याणपुर के विनायकपुर निवासी कोरोना संक्रमित सुरेश की मौत बेड न मिलने से हो गई। उनकी तबीयत एक सप्ताह से खराब थी। सांस लेने में तकलीफ हुई तो परिजन उन्हें एंबुलेंस में लेकर शहर के कई अस्पतालों में भटके, लेकिन हालत गंभीर बताकर किसी ने भर्ती नहीं किया। अंतत: गुरुदेव के पास एक निजी अस्पताल ने भर्ती किया, जहां तीन घंटे में उनकी जान चली गई। अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें वेंटिलेटर की जरूरत थी, जो उनके पास नहीं था।
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ऑक्सीजन मिली न बेड, पादरी की मौत
किदवईनगर के ब्लॉक निवासी कानपुर पास्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष पादरी जॉनसन डीएस को हफ्तेभर से बुखार आ रहा था। धीरे-धीरे उनकी तबीयत बिगड़ती गई। 22 अप्रैल को सांस लेने में तकलीफ हुई तो रिश्तेदार ऑक्सीजन और निजी अस्पतालों में बेड दिलाने के लिए भटकते रहे पर किसी ने भर्ती नहीं किया। 23 अप्रैल को उर्सला अस्पताल में भर्ती कराने ले जाते इससे पहले ही उनकी सांसें थम गईं। पादरी जितेंद्र सिंह ने कहा कि समय रहते किसी अस्पताल ने सुन ली होती तो जॉनसन की जान बचाई जा सकती थी।

अस्पताल अस्पताल दौड़े, पिता को बचा न पाए
रावतपुर के रहने वाले श्याम कुमार को सीने में दर्द और सांस लेने में तकलीफ थी। बेटी स्नेहा ने बताया कि सुबह से ही अस्पतालों के चक्कर काटे, लेकिन किसी ने भर्ती नहीं किया। हैलट लेकर आए तो डॉक्टर ने बताया कि मौत हो चुकी है। मौत की पुष्टि होते ही परिजन बेसुध हो गए।
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