कजली मेले में बुधवार की शाम आल्हा गायकों के नाम रही। आल्हा गायकों ने वीर आल्हा ऊदल के साहस और पराक्रम का बखान किया। आल्हा गायन की पंक्तियां सुनते ही श्रेाताओं में जोश भर गया। ढोलक मजीरा की धुन पर की गई आल्हा ऊदल की प्रस्तुति खासी सराहनीय रही।
बुधवार की शाम सात बजे आल्हा सम्राट वंशगोपाल यादव ने आल्हा गायन की शुरूआत कुछ इस तरह किया- एक को मारे दुई मर जाएं तीसरा खौफ खाए मर जाए... से की। इसके बाद होगी न देश की रक्षा पायल की झनकारों से होगी देश की रक्षा तीर और तलवारों से... सुनाकर लोगों में जोश भर दिया। आल्हा गायन सुनने के लिए ग्रामीणों की भारी भीड़ जमा रही। कजली मेले में आल्हा गायन सुनने के लिए दूर दराज से आने वाले लोग देर रात तक डटे रहे।
आल्हा गायिका शीलू सिंह ने भी एक से बढ़कर एक आल्हा प्रस्तुत किया। महिला कलाकार का आल्हा गायन सुनने के लिए लोग देर रात तक बैठे रहे। रात 7:45 बजे शीलू सिंह जैसे ही मंच पर आल्हा गायन की ड्रेस में पहुंची श्रोताओं ने तालियों से स्वागत किया। शीलू सिंह का आल्हा गायन सुनकर श्रोताओं की भुजाएं फड़क उठी। आल्हा गायन सुनने के लिए पुरुषों के अलावा कुछ ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं भी डटी रहीं।
एक स्थान पर सिमट जाने से उपेक्षित रहा गोरखगिरि मेला
ऐतिहासिक कजली मेले में गोरखगिरि और शहीद मेला उपेक्षित नजर आया। इस साल गोरखगिरि मेले के नाम पर पालिका प्रशासन ने सिर्फ दंगल कराकर निभाई रस्म। वहीं शहीद मेले भी उपेक्षा के चलते नहीं पहुंची दुकानें।
बारहवीं शताब्दी में शुरू हुए कजली मेला तीन स्थानों पर लगता था। पुरानी पंरपरा के अनुसार पहले दिन कीरत सागर दूसरे दिन गोरखगिरि परिसर में और तीसरे दिन हवेली दरवाजा मैदान में मेला लगता था। तीनों दिन अलग- अलग स्थानों पर मेला लगने की वर्षों पुरानी परंपरा अब खत्म होती जा रही है। बल्कि कजली मेला कीरत सागर तट पर सिमट कर रह गया है। हालांकि कुछ चुटपुट दुकानदार हवेली दरवाजा मैदान में पहुंच जाते हैं।
हवेली दरवाजा मैदान में अतिक्रमण किए जाने से मेला परिसर सिकुड़ कर रह गया है। शासन प्रशासन की अनदेखी के चलते हवेली दरवाजा मैदान तेजी से अतिक्रमण होता जा रहा है।
-कजली मेले की दूसरी शाम रही आल्हा गायकों के नाम
-आल्हा गायन सुनकर लोगों की फड़क उठी भुजाएं