बैसिलस थूरिन जियनसिस ( बीटी) का जीन अरहर और चना में ट्रांसफर करने में आईआईपीआर के विज्ञानियों को सफलता मिल गई है। अभी तक देश, विदेश में अरहर, चना की बीटी तकनीक पर काम नहीं हुआ था। अब फील्ड ट्रायल की अनुमति केंद्र सरकार से मांगी गई है। जुलाई 2017 तक फैसला आने की उम्मीद है। अरहर, चना की फसलों में हेलिकोवरपा कीट लगता है, जो 100 फीसदी फसल नष्ट करने में सक्षम है। इसको देखते हुए ही अरहर, चना के बीज में कीट का जीन ट्रांसफर कर दिया गया। यही जीन फसल की सुरक्षा करेगा।
बीटी तकनीक पर पिछले 20 साल से शोध चल रहा था। अब जाकर इसमें सफलता मिली है। बस अब फील्ड ट्रायल करने की तैयारी है। ऐसा हुआ तो अरहर, चना की फसल को रोग मुक्त कर दिया जाएगा। जो फली छेदक फसलों को 100 फीसदी तक नष्ट कर देती है, उसे बाहर कर दिया जाएगा।
क्या है बीटी
बीटी ऐसे काम करता है
बीटी एक बैक्टीरिया का नाम है। यह मिट्टी में पाया जाता है। इसके जीन नुकसानदायक कीड़ों को मारते हैं। बीटी का ही जीन क्राई वन एसी को पौधों में डाला जाता है। ये जीन केमिकल बनाकर कीड़ों को मार देते हैं। जीन ट्रांसफर से फसलों में कम केमिकल का प्रयोग करना पड़ेगा।
अरहर का हाइब्रिड बीज
बीटी के इस्तेमाल से तैयार अरहर
आईआईपीआर के विज्ञानियों ने अरहर की हाइब्रिड प्रजाति (आईपीएच 9-5) विकसित कर ली है। इसका सफल परीक्षण भी हो चुका है। मई 2017 तक प्रजाति रिलीज होगी, फिर अरहर के प्रति हेक्टेयर क्षेत्रफल में पैदावार 5-8 कुंतल बढ़ जाएगी। 8-10 की जगह 15-18 कुंतल फसल पैदा की जा सकेगी। इसकी बुआई जून में की जा सकती है। फसल 140-145 दिन में पक जाएगी। देश के किसी भी हिस्से में बुआई की जा सकेगी। खास बात यह है कि इस अरहर के बाद गेहूं की फसल भी ली जा सकेगी।
मीठी होगी हरी मटर
खेत में बीटी फसल की सुरक्षा के लिए बीटी रसायन छिड़काव
आईआईपीआर के विज्ञानियों ने हरी मटर की मीठी प्रजाति विकसित की है। इस मटर को सुखाकर रखा जाए, फिर पानी में भिगोकर सामान्य मटर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। केमिकल का प्रयोग नहीं करना पड़ेगा। इसकी बुआई अक्तूबर-नवंबर में की जा सकती है। आईआईपीआर से बीज प्राप्त किए जा सकते हैं। फसल 120 दिन में पक जाएगी। प्रति हेक्टेयर पैदावार 10-12 कुंतल है।
दलहन की 23 प्रजातियां विकसित
डेमो पिक
पिछले दो साल में दलहन की 23 प्रजातियां विकसित की गई हैं। इसमें नौ प्रजातियां आईआईपीआर कानपुर की हैं। मूंग की आईपीएम 205-07 प्रजाति तकनीकी लिहाज से सबसे बढ़िया पाई गई है। इसकी बुआई 25 मार्च से 10 अप्रैल के बीच की जा सकेगी। प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. आदित्य प्रताप ने बताया कि प्रति हेक्टेयर पैदावार 11-12 कुंतल है। फसल 40-45 दिन में तैयार हो जाएगी। खाने योग्य होगी खेसारी दाल खेसारी दाल से नुकसानदायक तत्व को हटाने का काम चल रहा है। निदेशक का कहना है कि आईआईपीआर के विज्ञानियों ने खेसारी दाल की महात्यौरा और प्रतीक सहित तीन प्रजातियां विकसित की हैं। अब इनसे नुकसानदायक तत्व को हटाया जा रहा है। इसमें सफलता मिली तो बाजार में बिक्री और खान-पान से राज्य सरकार रोक हटा सकती है। खेसारी की पैदावार बुंदेलखंड में खूब होती है। सूखाग्रस्त या फिर अधिक पानी वाले क्षेत्रों में भी फसल पैदा की जा सकती है।
ऊसर भूमि पर चना की पैदावार
डेमो पिक
चना की करनाल प्रजाति की बुआई ऊसर भूमि में की जा सकती है। इसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 15-18 कुंतल है। अक्तूबर, नवंबर में बुआई की जा सकती है। आईआईपीआर के विज्ञानी ने बताया कि देश में 116 लाख हेक्टेयर जमीन पर सिर्फ धान की खेती होती है। यह हल्की ऊसर की श्रेणी में आती है। क्षेत्रफल कई देशों के बराबर है। अब चना की नई प्रजाति की बुआई करने की तैयारी है।