नामांकन के साथ ही तंबाकू के नगर कायमगंज पर भी चुनावी नशा छाने लगा है। सवर्ण बाहुल्य सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने पर शुरुआत में राजनीतिक माहौल ठंडा पड़ा था, लेकिन कुछ दमदार चेहरों के निर्दलीय उतरने से राजनीति गरमा गई है।
फर्रुखाबाद- एशिया में तंबाकू की सबसे बड़ी मंडी कायमगंज को अंग्रेजों ने 1937 में घोषित कर किया था। इसके पहले अध्यक्ष सलमान खुर्शीद के दादा आलम खां मनोनीत किए गए थे। लंबे समय तक मनोनयन का सिलसिला चलता रहा। 1953 में शिवपाल सिंह वैद्य के अध्यक्ष बनने के साथ निकाय में राजनीति शुरू हो गई। वैद्य सभासदों से चुने नगर पंचायत के पहले अध्यक्ष थे। वैद्य के प्रयास से ही नगर पंचायत नगर पालिका बनीं। सभासदों के हाथ अध्यक्ष चुनने का पावर आते ही नगर पालिका पर व्यापारियों का दबदबा कायम हो गया। 1957 से 2006 तक नगर पालिका का अध्यक्ष व्यापारी ही चुना गया।
नरेश चंद्र गुप्ता सभासदों से चुने गए अंतिम अध्यक्ष थे। इसके साथ ही नगरीय निकाय अधिनियम में बदलाव हो गया और अध्यक्ष चुनने का अधिकार सीधे जनता के हाथ में चला गया। 1995 में मिथलेश जनता के वोट से पहली अध्यक्ष चुनी गईं। जिले के प्रमुख उद्यमी घराने की बहू मिथलेश 1995, 2000 और 2006 में लगातार तीन बार अध्यक्ष चुनी गईं। 2012 में सीट पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित होने पर व्यापारियों के हाथ से सीट निकल गई। लेकिन चिकित्सक घराने की बहू रीता गंगवार अध्यक्ष चुनी गईं।
इस बार सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने से सवर्ण और पिछड़े वर्ग के नेता शुरुआत में घरों में बैठ गए। इससे माहौल ठंडा पड़ गया था। दलीय प्रत्याशी घोषित होने के बाद पर्दे के पीछे से सवर्ण व ओबीसी नेता सक्रिय हो गए तो तंबाकू के नगर पर राजनीति का नशा भी छाने लगा। भाजपा ने अपना किला फिर वापस पाने के लिए सुनील चक पर दांव लगाया है तो सपा ने कल्लू यादव के ड्राइवर जयसिंह के हाथ में साइकिल का हैंडल थमा दिया है। बसपा ने रामशंकर और कांग्रेस दो बार सभासद रहे नाथूराम मौर्य के सहारे मैदान मारना चाहती है। बसपा के पास नगर के निवासी अशोक सिद्धार्थ और कांग्रेस के पास राष्ट्रीय नेता सलमाल खुर्शीद का चेहरा है। हर प्रत्याशी अपने आकाओं की बदौलत जातीय समीकरण साधने की कोशिश कर रहा है।
सबसे ज्यादा निगाहें सवर्ण और मुस्लिम वोटरों पर हैं। भाजपा और बसपा में बगावत बसपा जोनल कोआर्डिनेटर अशोक सिद्धार्थ के भाई डा. सुनीत सिद्धार्थ पार्टी से टिकट मांग रहे थे। बसपा ने रामशंकर को टिकट दे दिया। इससे सुनीत निर्दलीय मैदान में उतर गए हैं। भाजपा में भी बगावत हो गई है। पार्टी से टिकट की लाइन में रहे डा. सीपी निर्मल ने भी निर्दलीय ताल ठोंक दी है। दलीय उम्मीदवारों में सुनीत और निर्मल सबसे ज्यादा पढ़े लिखे हैं, दोनों ही पीएचडी हैं।
मुस्लिम व सवर्णों के हाथ में जीत की चाभी कायमगंज नगर पालिका में सवर्ण वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसके बाद मुस्लिम हैं। सीट अनुसूचित जाति के कोटे में जाने से इन दोनों ही वर्गों से कोई प्रत्याशी नहीं है लेकिन जीत की चाभी इन्हीं दोनों वर्गों के हाथ में रहेगी। भाजपा अपने परंपरागत ब्राह्मण, वैश्य के साथ पिछड़े वर्ग के मतदाताओं के सहारे हैं तो सपा मुस्लिम के साथ शाक्य, यादव व कुर्मी के दम पर जीत पक्की मान रही है। बसपा और कांग्रेस भी मुस्लिम वोट को अपने पक्ष में मान कर चल रही है।