जीवन के अंतिम समय में जब शरीर के कई अंग काम करना बंद कर चुके हों तो मशीन के सहारे इंसान को आखिर कितने समय तक जिंदा रखा जाए? कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में आईएमए सीजीपी के चौथे दिन बुधवार को डॉक्टरों ने इस संवेदनशील विषय पर खुलकर चर्चा की। डॉक्टरों ने एकमत होकर कहाकि यह ऐसा विषय है जिस पर अभी तक कोई कानून नहीं बना है। इसलिए मरीज के परिवारीजन और इलाज कर रहे डॉक्टर को मिलकर यह तय करना चाहिए कि कितने समय तक इलाज कराना जायज है।
‘इच्छा मृत्यु’ व ‘जीवन के अंतिम समय देखभाल’ विषय की वक्ता डॉॅ. अर्चना भदौरिया व डॉ. गौरव नाथ भल्ला ने कहाकि हर डॉक्टर चाहता है कि उसका जटिल से जटिल मरीज ठीक होकर जाए। यही उसकी उपलब्धि होती है। लेकिन ऐसी स्थितियां भी आती हैं जब मरीज ठीक नहीं हो पाता। बीमारी बढ़ती जाती है और शारीरिक स्थिति बिगड़ती जाती है। पूरा शरीर मशीन पर निर्भर हो जाता है। ऐसे में संकट इस बात का आता है कि आखिर मशीन के सहारे इंसान को कब तक जिंदा रखा जाए। सभी के लिए यह तय कर पाना कठिन है। कुछ देशों में ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कानून हैं, लेकिन भारत में यह स्थिति अभी चर्चा का विषय है। इस चर्चा में आईएमए प्रेसिडेंट डॉ. प्रवीण कटियार, डॉ. आरपीएस भदौरिया, डॉ. किरन मलहोत्रा डॉ. आरपीएस उपाध्याय एडवोकेट अजय भदौरिया भी शामिल रहे।
निर्णय लेना क्यों जरूरी
-अत्यधिक मशीनों व महंगी दवाओं की वजह से आर्थिक पहलू
-अस्पतालों में लाइफ केयर सिस्टम की सीमित उपलब्धता
-मरीज के कई अंग खराब हो चुके होते हैं। सिर्फ धड़कन जीवन का अहसास कराती है।
-सामान्य उम्र (60-70 वर्ष) पूरी कर चुके व्यक्ति को भी क्या महीनों या सालों तक मशीन के सहारे रखना चाहिए।