होलाष्टक दो मार्च से नौ मार्च तक रहेंगे। इस दौरान शुभ और मांगलिक कार्य नहीं होंगे। इस अवधि में यदि कोई ऐसा करता है तो परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज कुमार द्विवेदी ने बताया कि होलाष्टक दो मार्च (सोमवार) को दोपहर 12:52 बजे से प्रारंभ हो रहा है।
यह नौ मार्च को समाप्त होगा। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक दोष रहेगा जिसमें सभी शुभ कार्य वर्जित रहेंगे। भारतीय मुहूर्त विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस अवधि में विशेष रूप से विवाह, नए निर्माण व नए कार्यों को आरंभ नहीं करना चाहिए।
ऐसा ज्योतिष शास्त्र का कथन है। इन दिनों में किए गए कार्यों से कष्ट, अनेक पीड़ाओं की आशंका रहती है। विवाह आदि संबंध विच्छेद और कलह का शिकार हो जाते हैं या फिर अकाल मृत्यु का खतरा या बीमारी होने की आशंका बढ़ जाती है।
होलाष्टक से यह है तात्पर्य
होली के आठ दिन पूर्व से होलाष्टक की शुरुआत हो जाती है। होलाष्टक शब्द होली और अष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है। इसका अर्थ होता है होली के आठ दिन। होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू होकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तक रहता है।
अष्टमी तिथि से शुरू होने कारण भी इसे होलाष्टक कहा जाता है। हमें होली आने की पूर्व सूचना होलाष्टक से मिलती है। इसी दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं।
इस दौरान उग्र रहते हैं ग्रह
होलाष्टक के दौरान अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्त्रस्, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में रहते हैं। इन ग्रहों के उग्र होने के कारण मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है। जिसके कारण कई बार उससे गलत निर्णय भी हो जाते हैं। जिनकी कुंडली में नीच राशि के चंद्रमा और वृश्चिक राशि के जातक या चंद्र छठे या आठवें भाव में हैं। उन्हें इन दिनों अधिक सतर्क रहना चाहिए। होलाष्टक प्रारंभ होते ही प्राचीन काल में होलिका दहन वाले स्थान की गोबर, गंगाजल आदि से लिपाई की जाती थी। साथ ही वहां पर होलिका का डंडा लगा दिया जाता था
यह करते हैं होलाष्टक में
माघ पूर्णिमा से होली की तैयारियां शुरू हो जाती है। होलाष्टक आरंभ होते ही दो डंडों को स्थापित किया जाता है। इसमें एक होलिका का प्रतीक है और दूसरा प्रह्लाद से संबंधित है। ऐसा माना जाता है कि होलिका से पूर्व 8 दिन दाह-कर्म की तैयारी की जाती है।
होली से जुड़ी कथाएं
कहा जाता है जब प्रह्लाद को नारायण भक्ति से विमुख करने के सभी उपाय निष्फल होने लगे तो हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बंदी बना लिया और यातनाएं देने लगा। उसे मारने के लिए रोज अनेक उपाय किए जाने लगे लेकिन भगवत भक्ति में लीन प्रहलाद हमेशा जीवित बच जाते थे। इस तरह सात दिन बीत गए। आठवें दिन भाई हिरण्यकश्यप की परेशानी देख बहन होलिका (जिसे ब्रह्मा द्वारा अग्नि से न जलने का वरदान था) ने प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में भस्म करने का प्रस्ताव रखा।
होलिका जैसे ही भतीजे प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती आग में बैठी तो वहीं जलने लगी। प्रहलाद पुन: जीवित बच गए जबकि होलिका जल गई। इन्हीं आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है। ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के अपराध में कामदेव को शिव जी ने फाल्गुन की अष्टमी में भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उस समय क्षमा याचना की और शिव जी ने कामदेव को पुन: जीवित करने का आश्वासन दिया। इसी खुशी में लोग रंग खेलते हैं।