मामले में आरोपियों ने जमानत कराई थी
पांच लाख रुपये और सोने की चेन मांगी। मांग पूरी न होने पर निशा को घर से निकाल देने का आरोप लगाया गया था। घटना तीन मार्च 2020 की बताई गई थी। महिला थाने की तत्कालीन थानाध्यक्ष सुधा सिंह इस मामले में विवेचक थीं। सात माह की विवेचना के बाद आरोप पत्र न्यायालय में पेश किया गया। आरोपियों ने मामले में जमानत कराई थी। इसके बाद 13 अक्तूबर 2025 को आरोप तय करने के लिए तारीख लगी थी।
10:45 बजे विवेचना शुरू की और 11:30 बजे खत्म कर दी
इस पर आरोपियों ने अधिवक्ता के माध्यम से डिस्चार्ज (उन्मोचित) करने का प्रार्थना पत्र दिया था। इस पर आरोपियों ने कहा था कि पूरी जांच आधारहीन है। विवेचक ने थाने में ही बैठकर आरोप पत्र दाखिल किया है। प्रार्थना पत्र और आपत्तियों के अवलोकन के बाद सिविल जज ने आरोप पत्र में बड़ी खामियां पकड़ीं। इनमें सबसे अहम थी कि केस डायरी के मुताबिक विवेचक ने रात में 10:45 बजे विवेचना शुरू की और 11:30 बजे खत्म कर दी।
दबिश भी दी और वापस हरदोई भी आ गईं
इस दौरान विवेचक ने घटनास्थल (पीलीभीत) का निरीक्षण किया। वहां आरोपियों के पड़ोसियों के बयान लिए। नजरीनक्शा बनाया। दबिश भी दी और इसके बाद वापस हरदोई भी आ गईं। सिविल जज ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा कि यह सभी कार्रवाइयां 45 मिनट में संभव नहीं हैं। इसी आधार पर लक्ष्य अग्रवाल, विपिन कुमार अग्रवाल और पुष्पा अग्रवाल को आरोप तय होने से पहले ही आरोपों से बरी कर दिया।
असत्य, अविश्वसनीय, संदेहास्पद
सिविल जज लवलेश कुमार ने विवेचना को लेकर बेहद कठोर टिप्पणी अपने फैसले में की। फैसले में लिखा कि समयसारिणी असत्य है। अविश्वसनीय है और संदेहास्पद प्रतीत होती है इससे संपूर्ण विवेचना की प्रमाणिकता प्रभावित होती है। अपने फैसले में सिविल जज ने यह भी लिखा कि विवेचना की सुचिता और अभियोजन की विश्वसनीयता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
इसलिए फैसले में लिखनी पड़ीं कठोर टिप्पणियां
- पीड़िता का नाम निशा गुप्ता की जगह अंजू पाल लिख दिया गया।
- पीड़ित पक्ष के सभी गवाहों के बयान शब्दश: एक जैसे हैं। सोने की पांच तोले की मोटी जंजीर की जगह सोने की पांच तोने की मोटी जंजीर लिख गया। फिर सभी के बयान में पांच तोने ही आया है। मतलब यह कि इसे कॉपी पेस्ट किया गया।