हरदोई और मिश्रिख लोकसभा सीट को अपनी साख से जोड़ना कहीं न कहीं नरेश अग्रवाल की राजनीतिक मजबूरी भी है। इसकी बड़ी वजह यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में वह अब न तो विधायक हैं और न ही सांसद। पार्टी संगठन में भी उनके पास कोई पद नहीं है, लेकिन दोनों ही सीटों पर मैदान में उतरे भाजपा प्रत्याशियों की उनसे नजदीकियां जग जाहिर हैं। एक प्रत्याशी तो उनकी बनाई गई लोकतांत्रिक कांग्रेस के टिकट पर भी सांसद रह चुके हैं और जिस दल में नरेश अग्रवाल होते हैं कहीं न कहीं आगे पीछे वह भी वहीं पहुंच जाते हैं।
नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल सदर सीट से विधायक हैं। प्रदेश सरकार में आबकारी मंत्री हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी वह अपनी सीट बचाने में कामयाब होते रहे हैं। चुनावी मैदान में वह भी नहीं हैं, लेकिन नामांकन दाखिल होने के बाद से वह हरदोई और मिश्रिख लोकसभा क्षेत्र अंतर्गत हरदोई जनपद में 26 बड़ी छोटी जनसभाएं कर चुके हैं। नितिन अग्रवाल को विधानसभा चुनाव में हरदोई सीट से 43 हजार से अधिक वोटों से जीत मिली थी। अपने क्षेत्र में इस प्रदर्शन से बेहतर कर दिखाने की चुनौती भी उनके सामने है।
नरेश अग्रवाल के पुत्र नितिन अग्रवाल ही नहीं बल्कि भाई मुकेश अग्रवाल भी लोकसभा चुनाव में सक्रिय हैं। मुकेश अग्रवाल परोक्ष-अपरोक्ष रूप से 20 साल तक जिला पंचायत के कर्ता-धर्ता रहे हैं। दो बार खुद और एक बार उनकी पत्नी जिला पंचायत की अध्यक्ष रही हैं। मौजूदा समय में भी मुकेश अग्रवाल जिला पंचायत के सदस्य हैं। उन्हें सांडी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सुरसा के इलाके की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वह इस इलाके में अब तक 25 छोटी-छोटी सभाएं कर चुके हैं।