दरअसल, मरीजों की दी जाने वाली मेडिकल ऑक्सीजन गैस विशेष प्रक्रिया के तहत तैयार की जाती है। यह 99 प्रतिशत से ज्यादा शुद्ध होती है, जबकि इंडस्ट्रियल गैस औद्योगिक उपयोग के लिए होती है, जिसमें शुद्ध ऑक्सीजन का प्रतिशत कम होता है। कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड आदि नुकसानदायक गैसों के साथ अन्य अशुद्धियां होने की आशंका होती है।
ब्लैक फंगस के मरीजों पर शोध किया जाएगा। इस बीमारी के फैलने की वजह जानने की कोशिश की जाएगी। मुख्यतया स्टेरॉयड, इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन गैस के इस्तेमाल की जांच होती है क्योंकि ऐसी गैस से भी यह बीमारी हो सकती है। - डॉ. अपूर्व अग्रवाल, विभागाध्यक्ष, एनेस्थीसिया विभाग, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज
ब्लैक फंगस के मरीजों में मुख्यतया इन बिंदुओं पर होगा शोध
- क्या उन्हें कोरोना हुआ था?
- क्या डायबिटीज था?
- क्या उन्हें इलाज के दौरान स्टेरॉयड दिए गए, यदि हां तो कौन से और कितनी मात्रा में ?
- क्या उन्हें इलाज के दौरान इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन गैस दी गई ?
- सिलिंडर से ऑक्सीजन देते समय नमी के लिए जो पानी यूज किया गया, वो कैसा था?
- सिलिंडर से ऑक्सीजन देते समय जिस उपकरण में पानी भरा गया, उसे ठीक से साफ किया जाता रहा या नहीं?
- बीमारी से पहले उनका स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता कैसी थी?
- क्या उनका लंग्स, लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था?
- उन्हें इम्यूनो सेपरेशन ड्रग दी गईं थी?
- क्या मरीज को पहले कैंसर या अन्य कोई गंभीर बीमारी हुई थी?