कानपुर। नगर निगम का ठेकेदार गोविंद शर्मा पूरा सिंडीकेट चला रहा था। इसके सिंडीकेट में 10-12 ठेकेदार हैं। सफेदपोश सरगना के संरक्षण पर नगर निगम में इसकी हुकूमत चलती थी। इसका दखल हर बड़े टेंडर के साथ ही अन्य विभागों के टेंडरों में भी था। उसकी दहशत का आलम यह था कि कोई भी उसके खिलाफ टेंडर डालने की हिमाकत नहीं करता था।
फजलगंज और स्वरूपनगर में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद फरार चल रहे गोविंद शर्मा के खिलाफ जांच तेज हो गई है। उसकी कंपनी कैला इंटरप्राइजेज अब तक नगर निगम के 13 करोड़ के कार्य करा चुकी है। गोविंद शर्मा का सिंडीकेट पंजीकृत फर्मों को ठेके बांटने, टेंडर की लागत आदि तय करता था। यह आगरा से करीब 20 से 25 साल पहले कानपुर आया था। इसके सिंडिकेट में ठेकेदार संदीप जैन, रज्जन बाजपेई जैसे 10 से 12 ठेकेदार भी शामिल हैं। गोविंद शर्मा ठेकेदारों को डरा-धमका कर 15 प्रतिशत डाउन पेमेंट में टेंडर डलवाता था। इसके बाद 85 प्रतिशत पर एक रेट खुलने पर लकी ड्रा निकाला जाता था जिसके बाद गोविंद की सांठगांठ वाली फर्म को ही टेंडर मिलता था। सिंडीकेट में शामिल ठेकेदारों को .05 से 01 प्रतिशत पर ठेके हो रहे थे, लेकिन 15 प्रतिशत कम तक टेंडर डालने वालों के ठेके नहीं हो रहे थे। बीच का यह मार्जिन माफिया और इनके तथाकथित संचालक की जेब में जा रहा था।
नगर निगम सूत्रों के मुताबिक, गोविंद का सिंडीकेट ही नगर निगम के ठेकों में दबदबा बनाता था। बताया तो यह भी जा रहा है कि गोविंद का एक भाई पूर्व में कानपुर नगर निगम कर्मी भी रह चुका है जिसकी मदद से उसने यहां अपना जाल बिछाया।
मैनेज करता था ठेके
गोविंद शर्मा ही ठेकों को मैनेज कराता था। इसके साथ ही फर्जी फर्मों का रजिस्ट्रेशन भी यही कराता था। सड़क बनाने का प्लांट न होने पर भी पंजीकरण करा देता था। इसके सिंडीकेट में शामिल ठेकेदारों को ही टेंडर मिलता था। इसमें सात से 15 प्रतिशत तक कमीशन का खेल चल रहा था।
अलग तरीके का ही भ्रष्टाचार
नगर निगम के कुछ छोटे ठेकेदारों ने बताया कि यह अलग तरीके का भ्रष्टाचार है। यहां अपने चहेते या सुविधा देने वालों को ठेका मिलता है। मान लीजिए कि नगर निगम के 100 टेंडर निकलें लेकिन 10 बड़े टेंडर ऑनलाइन दिखते ही नहीं हैं। अगर टेंडर बंद होने का समय दोपहर 03:30 बजे है तो एक घंटा पहले वेबसाइट पर अपलोड होते हैं। इससे ठेकेदार उसमें हिस्सा नहीं ले पाते और सिंडीकेट में शामिल ठेकेदारों को बड़े ठेके मिल जाते हैं। पूरा काम सिस्टम से होता है।
इन बिंदुओं पर जांच
- किन-किन बड़ी फर्मों को लगातार बड़े ठेके दिए जा रहे हैं।
- ठेकेदारी के लिए गठित समिति ने किन फर्मों का मानकों पर ताक पर रख पंजीकरण किया।
- 15वें वित्त आयोग के मद से हुए सभी कार्यों का भौतिक सत्यापन शुरू किया गया है।
- 15 प्रतिशत तक कम टेंडर डालने वाले बाहर हुए और .05 से 01 तक कम टेंडर डालने वालों को ठेका कैसे मिला।
- बड़े ठेकों में ऑनलाइन कैसे खेल किया जा रहा था।
- वेबसाइट पर टेंडर बंद होने से सिर्फ एक घंटा पहले ही क्यों दिखता था।
- तीन साल में किस कंपनी को कितने करोड़ के ठेके मिले।
- एक ही फर्म को लगातार बड़े ठेके कैसे मिलते रहे।
बागी पार्षद बोले - बंटी टैक्स से चल रहा ठेका
नगर निगम में टेंडरों के खेल में कार्रवाई की भनक लगते ही बागी छह पार्षद भी पुलिस कमिश्नर कार्यालय ज्ञापन देने पहुंचे लेकिन उन्होंने मिलने से इन्कार कर दिया। बागी पार्षद पवन गुप्ता व अन्य ने कहा कि नगर निगम में बंटी टैक्स देने वालों को ही ठेका मिल रहा है। नगर निगम के ठेके बेचे जा रहे हैं। अगर जांच हो जाएगी तो सब सामने आ जाएगा। सीएम ने जिस माफिया टैक्स की बात की है उसका नाम बंटी टैक्स है। महापौर का बेटा बंटी ही नगर निगम में भ्रष्टाचार की जड़ है। बागी पार्षदों ने कार्रवाई की मांग की है।