टेनरियों और गंगा में सीधे गिरने वाले नालों की निगरानी के लिए सीपीसीबी (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) ड्रोन कैमरे का इस्तेमाल करेगा। बोर्ड की छह सदस्यीय टीम ने यहां आकर ड्रोन कैमरे के जरिए यह देखने का प्रयास किया कि यह नई तकनीक गंगा को प्रदूषण मुक्त करने में कितनी कारगर हो सकती है। जल्द ही इसे स्थायी व्यवस्था के रूप में बदला जाएगा।
अभी कम क्षमता वाले ड्रोन से निरीक्षण किया गया है। जिसका दायरा दो से ढाई किलोमीटर है। सीपीसीबी ऐसे कैमरे का इस्तेमाल करना चाहता है जो चार किलोमीटर का रेडियस कवर कर सके। केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच गंगा प्रदूषण रोकने के संबंध में लेकर चल रही रस्साकसी के बीच सीपीसीबी जल संसाधन मंत्रालय के नेतृत्व में काम कर रहा है। बताया जा रहा है कि 22 जुलाई को दिल्ली में होने वाली एनजीटी की सुनवाई में ड्रोन कैमरे से परीक्षण के संदर्भ में भी चर्चा हो सकती है।
इस बीच ड्रोन कैमरे की क्षमता को लेकर भी सीपीसीबी के वैज्ञानिक पड़ताल करने में जुटे हैं। बोर्ड की योजना है कि पहले गंगा किनारे स्थापित सभी उद्योगों का निरीक्षण किया जाएगा, इसके बाद तय होगा कि किन उद्योगों को इनके दायरे में लाया जाए। सीपीसीबी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुनील दवे का कहना है कि अभी यह व्यवस्था प्रारंभिक अवस्था में है। क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी डॉ. मोहम्मद सिकंदर का कहना है कि इस व्यवस्था के जरिए गंगा के आसपास की भी मॉनीटरिंग होगी।
ड्रोन से इन पर निगरानी
गंगा में गिरने वाला ड्रेनेज सिस्टम कितना दूर से आ रहा है, रोजना कितनी दूर तक कचरा गिरता है
गंगा किनारे बने घाटों व किनारों पर कहां कितनी गंदगी है।
रात में भी निगरानी, जिससे चोरी छिपे कचरा डालने वाले उद्योग पकड़ में आएंगे
कैमरे को ऊंचाई में ले जाकर रोक देंगे, जिससे चार किमी के दायरे में निरीक्षण हो सके