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नई बीमारी की चपेट में हैं इस शहर के बच्चे, अाप भी रहें सतर्क

Thu, 13 Sep 2018 12:45 PM IST
मनोज चौरसिया, अमर उजाला, कानपुर

सार

- दो स्कूलों के कई बच्चों में बीमारी की पुष्टि हुई
- हाथ, पैर, मुंह में छाले और शरीर पर चकत्ते पड़ जाते हैं
- पहले यह बीमारी जानवरों में खुरपका के नाम से जानी जाती थी 
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यूपी के कानपुर शहर के बच्चों में पहली बार हैंड फुट माउथ डिसीज (एचएफएमडी) होने की पुष्टि हुई है। दो स्कूलों के आठ बच्चों में यह बीमारी मिली है। इन सभी के हाथों, पैरों, मुंह में छाले पड़ गए हैं। बच्चों खासकर पांच साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाली बीमारी संक्रमित बच्चे के छींकने से हवा में वायरस पहुंचने या छाले का पानी लगने से दूसरे बच्चों को होती है। पहले यह बीमारी जानवरों में खुरपका के नाम से जानी जाती थी। 10 साल पहले पूना में यह बीमारी फैलने पर सभी स्कूल कुछ समय के लिए बंद कर दिए गए थे। 

बुधवार को हैलट ओपीडी के बाल रोग विभाग में मरीजों का स्वास्थ्य परीक्षण करने वाले मेडिकल कालेज के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राज तिलक ने बताया कि स्वरूप नगर स्थित एक निजी स्कूल की एक ही कक्षा के पांच बच्चे उनसे इलाज कराने आए। कौशलपुरी नगर स्थित एक निजी स्कूल के एक ही कक्षा के तीन बच्चे भी उनसे इलाज करा रहे हैं। एचएफएमडी बीमारी फैलाने वाला ‘कॉकसेकी’ वायरस मुंह के अंदर तालू, होठों, जीभ में छाले और हाथों, पैरों, हिप्स में चकत्ते पैदा करता है।

घाव होने पर ये अल्सर में तब्दील हो जाते हैं। छालों में खुजली नहीं होती है। इस बीमारी में खाना निगलने में बहुत दर्द होता है। इसका वायरस हवा के माध्यम से सामान्य लोगों को चपेट में ले लेता है, जिसकी वजह से यह बीमारी आसानी से फैलती है। डॉक्टर से स्वास्थ्य परीक्षण कराना जरूरी है। 
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कॉकसेकी वायरस संक्रमित बच्चे के छींकने, खांसने से आसपास हवा में फैल जाता है और उस परिधि में आने वाले बच्चे इसकी चपेट में आ जाते हैं। इसके अलावा यदि संक्रमित बच्चे के छाले का पानी मेज, कुर्सी, दरवाजे के कुंडे आदि में लग जाता है तो बाद में जो बच्चे उसे छूता है या उसके संपर्क में आता है, वह भी इसकी चपेट में आ जाता है। डॉ. राज तिलक ने दावा किया कि शहर में पहली बार एचएफडीएम के मरीज मिले हैं। 
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लक्षण

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त्वचा में चकत्ते, त्वचा की परत उतरना, फफोला या लाल धब्बे, बुखार, खांसी, गले मे खराश, सिरदर्द,  चिडचिड़ापन, भूख न लगना। मरीज को खाना निगलते समय दर्द होता है। मरीज को थकान, बुखार, शरीर में पानी की कमी, अच्छा महसूस न होना। 

उपचार

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डॉ. राजतिलक के अनुसार इस बीमारी में लक्षणों के आधार पर दवाएं दी जाती हैं। यदि बुखार हो तो पैरासीटामॉल ही देना चाहिए। पैरासीटामॉल की जगह एस्परीन देने से लिवर फेल होने का खतरा रहता है। इसलिए मरीज को एस्परीन कतई न दें। दर्द हो तो दर्द से राहत देने वाली दवाएं लक्षणों से छुटकारा दिलाने में मदद करती हैं। यह बीमारी हफ्ते - 10 दिन में स्वत: ठीक हो जाती है। 
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सलाह

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- यह बीमारी छोटे बच्चों को होती है। इसलिए संक्रमित बच्चे को स्कूल न भेजें, बल्कि घर में ही आइसोलेशन (अन्य परिजनों से अलग) रखें। 
- बीमार बच्चे को छींक आए तो रूमाल या दोनों हाथ इस तरह लगाएं कि वायरस हवा में कम से कम फैले। 
- संक्रमित हाथ तुरंत साबुन से धोएं। 
- यदि छाले में हाथ लग जाए तो उसका पानी कहीं और न लगाएं, बल्कि तुरंत साबुन से अच्छी तरह धोएं। 
- बीमार बच्चे को मिर्च - मसाले वाला खाना न दें, बल्कि दलिया, दूध, खिचड़ी दें। 
- बच्चे को खूब पानी, शर्बत पिलाएं। 
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