मंजिलें उन्हें मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है... ये लाइनें साकेत नगर की नेहा गांधी पर सटीक बैठती हैं। सीए बनने से पहले नेहा ने हिम्मत, हौसले और लगन की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसे सुनकर मन ‘नेहा को सलाम’ कह उठता है।
टिंबर मर्चेंट अमरजीत गांधी की इकलौती बेटी नेहा के बचपन के शुरुआती दिन खुशहाली में बीते। माता महिंदर कौर के अलावा बड़े भाई रमनदीप के साथ जीवन शान-ओ-शौकत से व्यतीत हो रहा था तभी परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। वर्ष 2001 में सड़क हादसे में नेहा के पिता का निधन हो गया।
उस वक्त वह महज 12 साल की थीं और भाई रमनदीप 16 साल के। कई महीनों तक परिवार इस दर्द से उबर नहीं सका। आखिरकार रमनदीप ने नाजुक सी उम्र में पिता का व्यवसाय संभाला तो नेहा ने गमगीन मां और परिवार को। नेहा बताती हैं, हाईस्कूल तक की पढ़ाई साकेत नगर के सुभाष मेमोरियल स्कूल और 12वीं तक की आनंदपुरी स्थित ओंकारनाथ धवन स्कूल में की।
बीकॉम करते हुए भाई ने चार्टर्ड एकाउंटेंट बनने का सपना दिखाया। सीए की पढ़ाई शुरू भी कर दी थी लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। उसे एक बार फिर ऐसा दर्द मिला जिससे उबरना आसान नहीं रहा। वर्ष 2011 में 26 वर्ष की उम्र में भाई रमनदीप की भी बीमारी से मौत हो गई।
भाई की मौत के गम में सारे सपने बिखरते से लगे। पहले पिता फिर भाई के असमय जाने से जीवन ठहर सा गया। भाई ने पिता का व्यवसाय बदलकर दूसरा काम शुरू किया था, इसलिए उनके न रहने पर वह भी खत्म हो गया। घर में आमदनी का कोई जरिया नहीं था। ऐसे में देश के सबसे कठिन कोर्स में शुमार सीए की पढ़ाई आसान नहीं थी। आखिरकार भाई के दिखाए सपनों ने फिर से उठ खड़े होने का हौसला दिया।
ठान लिया कि अब सीए बनकर ही दम लेना है। ट्यूशन और कोचिंग पढ़ाकर परिवार को संभाला और अपनी पढ़ाई का खर्चा निकाला। बुजुर्ग मां और भाई की एक साल की बेटी को भी संभाला। दिन रात मेहनत का नतीजा यह है कि कानपुर का रिजल्ट महज एक फीसदी होने के बावजूद वह चार्टर्ड एकाउंटेंट बन गई है। नेहा ने एक और मिसाल पेश की, भाई की मौत के बाद भाभी का दूसरा ब्याह कराया और उनकी बेटी खुद पालने का निर्णय लिया।